भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 2035

दर्शनीयोऽनवद्याङ्गस्तेजसा प्रज्वलन्निव । मधुपिङ्गो मधुरवाक् तपःस्वाध्यायभूषणः ॥ ५ ॥ उनका स्वरूप देखने ही योग्य था। उनके सभी अंग निर्दोष थे। वे तेजसे प्रज्वलित होते-से जान पड़ते थे। उनके शरीरकी कान्ति मधुके समान पिंगलवर्णकी थी। वे मधुर वचन बोलनेवाले तथा तपस्या और स्वाध्यायरूप सद्गुणोंसे विभूषित थे ॥ ५ ॥ स राजानं कुन्तिभोजमब्रवीत् सुमहातपाः । भिक्षामिच्छामि वै भोक्तुं तव गेहे विमत्सर ॥ ६ ॥ उन महातपस्वीने राजा कुन्तिभोजसे कहा—'किसीसे ईर्ष्या न करनेवाले नरेश! मैं तुम्हारे घरमें भिक्षान्न भोजन करना चाहता हूँ ॥ ६ ॥ न मे व्यलीकं कर्तव्यं त्वया वा तव चानुगैः । एवं वत्स्यामि ते गेहे यदि ते रोचतेऽनघ ॥ ७ ॥ 'परंतु एक शर्त है, तुम या तुम्हारे सेवक कभी मेरे मनके प्रतिकूल आचरण न करें। अनघ! यदि तुम्हें मेरी यह शर्त ठीक जान पड़े तो उस दशामें मैं तुम्हारे घरमें निवास करूँगा ॥ ७ ॥ यथाकामं च गच्छेयमागच्छेयं तथैव च । शय्यासने च मे राजन् नापराध्येत कश्चन ॥ ८ ॥