भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2041

क्योंकि पृथ्‍वीपते! महाभाग ब्राह्मण भलीभाँति पूजित होनेपर सेवकको तारनेमें समर्थ होते हैं; और इसके विपरीत अपमानित होनेपर विनाशकारी बन जाते हैं ।। ७ ।।
साहमेतद् विजानन्ती तोषयिष्ये द्विजोत्तमम् ।
न मत्कृते व्यथां राजन् प्राप्स्यसि द्विजसत्तमात् ।। ८ ।।
मैं इस बातको जानती हूँ। अतः इन श्रेष्ठ ब्राह्मणको सब तरहसे संतुष्ट रखूँगी। राजन्! मेरे कारण इन द्विजश्रेष्ठसे आपको कोई कष्ट नहीं प्राप्त होगा ।। ८ ।।
अपराधेऽपि राजेन्द्र राज्ञामश्रेयसे द्विजाः ।
भवन्ति च्यवनो यद्वत् सुकन्यायाः कृते पुरा ।। ९ ।।
राजेन्द्र! किसी बालिकाद्वारा अपराध बन जानेपर भी ब्राह्मणलोग राजाओंका अमंगल करनेको उद्यत हो जाते हैं, जैसे प्राचीनकालमें सुकन्याद्वारा अपराध होनेपर महर्षि च्यवन महाराज शर्यातिको अनिष्ट करनेको उद्यत हो गये थे ।। ९ ।।
नियमेन परेणाहमुपस्थास्ये द्विजोत्तमम् ।
यथा त्वया नरेन्द्रेदं भाषितं ब्राह्मणं प्रति ।। १० ।।
नरेन्द्र! आपने ब्राह्मणके प्रति बर्ताव करनेके विषयमें जो कुछ कहा है, उसके अनुसार मैं उत्तम नियमोंके पालनपूर्वक इन श्रेष्ठ ब्राह्मणकी सेवामें उपस्थित रहूँगी ।।
एवं ब्रुवन्तीं बहुशः परिष्वज्य समर्थ्य च ।
इति चेति च कर्तव्यं राजा सर्वमथादिशत् ।। ११ ।।
इस प्रकार कहती हुई कुन्तीको बारंबार गलेसे लगाकर राजाने उसकी बातोंका समर्थन किया और कैसे-कैसे क्या-क्या करना चाहिये, इसके विषयमें उसे सुनिश्चित आदेश दिया ।। ११ ।।

राजोवाच

एवमेतत् त्वया भद्रे कर्तव्यमविशङ्कया ।
मद्धितार्थं तथाऽऽत्मार्थं कुलार्थं चाप्यनिन्दिते ।। १२ ।।
राजा बोले— भद्रे! अनिन्दिते! मेरे, तुम्हारे तथा कुलके हितके लिये तुम्हें निःशंकभावसे इसी प्रकार यह सब कार्य करना चाहिये ।। १२ ।।
एवमुक्त्वा तु तां कन्यां कुन्तिभोजो महायशाः ।
पृथां परिददौ तस्मै द्विजाय द्विजवत्सलः ।। १३ ।।
ब्राह्मणप्रेमी महायशस्वी राजा कुन्तिभोजने पुत्रीसे ऐसा कहकर उन आये हुए द्विजकी सेवामें पृथाको दे दिया ।। १३ ।।
इयं ब्रह्मन् मम सुता बाला सुखविवर्धिता ।
अपराध्येत यत्र किंचिन्न कार्यं हृदि तत् त्वया ।। १४ ।।