भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 2045, कुल 2580 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2045

वे कभी ऐसे समयमें लौटकर आते थे, जब कि पृथाको दूसरे कामोंसे दम लेनेकी भी फुरसत नहीं होती थी और कभी वे कई दिनोंतक आते ही नहीं थे। आनेपर भी ऐसा भोजन माँग लेते जो अत्यन्त दुर्लभ होता ॥ ६ ॥

कृतमेव च तत् सर्वं यथा तस्मै न्यवेदयत् । शिष्यवत् पुत्रवच्चैव स्वसृवच्च सुसंयता ॥ ७ ॥

परंतु कुन्ती उन्हें उनकी माँगी हुई सब वस्तुएँ इस प्रकार प्रस्तुत कर देती थी, मानो उनको पहलेसे ही तैयार करके रखा हो। वह अत्यन्त संयत होकर शिष्य, पुत्र तथा छोटी बहिनकी भाँति सदा उनकी सेवामें लगी रहती थी ॥ ७ ॥

यथोपजोषं राजेन्द्र द्विजातिप्रवरस्य सा । प्रीतिमुत्पादयामास कन्यारत्नमनिन्दिता ॥ ८ ॥

राजेन्द्र! उस अनिन्द्य कन्यारत्न कुन्तीने उन श्रेष्ठ ब्राह्मणको उनकी रुचिके अनुसार सेवा करके अत्यन्त प्रसन्न कर लिया ॥ ८ ॥

तस्यास्तु शीलवृत्तेन तुतोष द्विजसत्तमः । अवधानेन भूयोऽस्याः परं यत्नमथाकरोत् ॥ ९ ॥

उसके शील, सदाचार तथा सावधानीसे उन द्विजश्रेष्ठको बड़ा संतोष हुआ। उन्होंने कुन्तीका हित करनेका पूरा प्रयत्न किया ॥ ९ ॥

तां प्रभाते च सायं च पिता पप्रच्छ भारत । अपि तुष्यति ते पुत्रि ब्राह्मणः परिचर्यया ॥ १० ॥

जनमेजय! पिता कुन्तिभोज प्रतिदिन प्रातःकाल और सायंकालमें पूछते थे—'बेटी! तुम्हारी सेवासे ब्राह्मणको संतोष तो है न?' ॥ १० ॥

तं सा परममित्येव प्रत्युवाच यशस्विनी । ततः प्रीतिमवापाग्र्यां कुन्तिभोजो महामनाः ॥ ११ ॥

वह यशस्विनी कन्या उन्हें उत्तर देती—'हाँ पिताजी! वे बहुत प्रसन्न हैं।' यह सुनकर महामना कुन्तिभोजको बड़ा हर्ष प्राप्त होता था ॥ ११ ॥

ततः संवत्सरे पूर्णे यदासौ जपतां वरः । नापश्यद् दुष्कृतं किंचित् पृथायाः सौहृदे रतः ॥ १२ ॥ ततः प्रीतमना भूत्वा स एनां ब्राह्मणोऽब्रवीत् । प्रीतोऽस्मि परमं भद्रे परिचारेण ते शुभे ॥ १३ ॥ वरान् वृणीष्व कल्याणि दुरापान् मानुषैरिह । यैस्त्वं सीमन्तिनीः सर्वा यशसाभिभविष्यसि ॥ १४ ॥

तदनन्तर जब एक वर्ष पूरा हो गया और पृथाके प्रति वात्सल्य स्नेह रखनेवाले जपकर्ताओंमें श्रेष्ठ ब्राह्मण दुर्वासाजीने उसकी सेवामें कोई त्रुटि नहीं देखी, तब वे प्रसन्नचित्त होकर पृथासे इस प्रकार बोले—'भद्रे! मैं तुम्हारी सेवासे बहुत प्रसन्न हूँ। शुभे!

महाभारत (खंड २) - वन पर्व · पृष्ठ 2045, कुल 2580 में से · BharatKosha