महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2062, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंनवाधिकत्रिशततमोऽध्यायः
अधिरथ सूत तथा उसकी पत्नी राधाको बालक कर्णकी प्राप्ति, राधाके द्वारा उसका पालन, हस्तिनापुरमें उसकी शिक्षा-दीक्षा तथा कर्णके पास इन्द्रका आगमन
वैशम्पायन उवाच
एतस्मिन्नेव काले तु धृतराष्ट्रस्य वै सखा ।
सूतोऽधिरथ इत्येव सदारो जाह्नवीं ययौ ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इसी समय राजा धृतराष्ट्रका मित्र अधिरथ सूत अपनी स्त्रीके साथ गङ्गाजीके तटपर आया ॥ १ ॥
तस्य भार्याभवद् राजन् रूपेणासदृशी भुवि ।
राधा नाम महाभागा न सा पुत्रमविन्दत ॥ २ ॥
राजन्! उसकी परम सौभाग्यवती पत्नी इस भूतलपर अनुपम सुन्दरी थी। उसका नाम था राधा। उसके कोई पुत्र नहीं हुआ था ॥ २ ॥
अपत्यार्थे परं यत्नमकरोच्च विशेषतः ।
सा ददर्शार्थ मञ्जूषामुह्यमानां यदृच्छया ॥ ३ ॥
राधा पुत्रप्राप्तिके लिये विशेष यत्न करती रहती थी। दैवयोगसे उसीने गङ्गाजीके जलमें बहती हुई उस पिटारीको देखा ॥ ३ ॥
दत्तरक्षाप्रतिसरामन्वालम्भनशोभनाम् ।
ऊर्मीतरङ्गजाह्नव्याः समानीतामुपह्वरम् ॥ ४ ॥
पिटारीके ऊपर उसकी रक्षाके लिये लता लपेट दी गयी थी और सिन्दूरका लेप लगा होनेसे उसकी बड़ी शोभा हो रही थी। गङ्गाकी तरंगोंके थपेड़े खाकर वह पिटारी तटके समीप आ लगी ॥ ४ ॥
सा तु कौतूहलात् प्राप्तां ग्राहयामास भामिनी ।
ततो निवेदयामास सूतस्याधिरथस्य वै ॥ ५ ॥
भामिनी राधाने कौतूहलवश उस पिटारीको सेवकोंसे पकड़वा मँगाया और अधिरथ सूतको इसकी सूचना दी ।।
स तामुद्धृत्य मञ्जूषामुत्सार्य जलमन्तिकात् ।
यन्त्रैरुद्घाटयामास सोऽपश्यत् तत्र बालकम् ॥ ६ ॥
अधिरथने उस पिटारीको पानीसे बाहर निकालकर जब यन्त्रों (औजारों) द्वारा उसे खोला, तब उसके भीतर एक बालकको देखा ॥ ६ ॥