महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 209, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्णामेव पापानामस्रं न पतितं तदा । त्वयि भारत निष्क्रान्ते वनायाजिनवाससि ॥ ७ ॥ भारत! जब आप वल्कल-वस्त्र धारण करके वनमें जानेके लिये निकले, उस समय केवल चार ही पापात्माओंके नेत्रोंसे आँसू नहीं गिरा था ॥ ७ ॥
दुर्योधनस्य कर्णस्य शकुनेश्च दुरात्मनः । दुर्भ्रातुस्तस्य चोग्रस्य राजन् दुःशासनस्य च ॥ ८ ॥ दुर्योधन, कर्ण, दुरात्मा शकुनि तथा उग्र स्वभाव-वाले दुष्ट भ्राता दुःशासन—इन्हींकी आँखोंमें आँसू नहीं थे ॥ ८ ॥
इतरेषां तु सर्वेषां कुरूणां कुरुसत्तम । दुःखेनाभिपरीतानां नेत्रेभ्यः प्रापतज्जलम् ॥ ९ ॥ कुरुश्रेष्ठ! अन्य सभी कुरुवंशी दुःखमें डूबे हुए थे और उनके नेत्रोंसे अश्रुवर्षा हो रही थी ॥ ९ ॥
इदं च शयनं दृष्ट्वा यच्चासीत् ते पुरातनम् । शोचामि त्वां महाराज दुःखानर्हं सुखोचितम् ॥ १० ॥ महाराज! आज आपकी यह शय्या देखकर मुझे पहलेकी राजोचित शय्याका स्मरण हो आता है और मैं आपके लिये शोकमें मग्न हो जाती हूँ; क्योंकि आप दुःखके अयोग्य और सुखके ही योग्य हैं ॥ १० ॥
दान्तं यच्च सभामध्ये आसनं रत्नभूषितम् । दृष्ट्वा कुशवृषीं चेमां शोको मां प्रदहत्ययम् ॥ ११ ॥ सभाभवनमें जो रत्नजटित हाथीदाँतका सिंहासन है, उसका स्मरण करके जब मैं इस कुशकी चटाईको देखती हूँ, तब शोक मुझे दग्ध किये देता है ॥ ११ ॥
यदपश्यं सभायां त्वां राजभिः परिवारितम् । तच्च राजन्नपश्यन्त्याः का शान्तिर्हृदयस्य मे ॥ १२ ॥ राजन्! मैं इन्द्रप्रस्थकी सभामें आपको राजाओंसे घिरा हुआ देख चुकी हूँ, अतः आज वैसी अवस्थामें आपको न देखकर मेरे हृदयको क्या शान्ति मिल सकती है? ॥ १२ ॥
या त्वाहं चन्दनादिग्धमपश्यं सूर्यवर्चसम् । सा त्वां पङ्कमलादिग्धं दृष्ट्वा मुह्यामि भारत ॥ १३ ॥ भारत! जो पहले आपको चन्दनचर्चित एवं सूर्यके समान तेजस्वी देखती रही हूँ, वही मैं आपको कीचड़ एवं मैलसे मलिन देखकर मोहके कारण दुःखित हो रही हूँ ॥ १३ ॥
या त्वाहं कौशिकैर्वस्त्रैः शुभ्रैराच्छादितं पुरा । दृष्टवत्यस्मि राजेन्द्र सा त्वां पश्यामि चीरिणम् ॥ १४ ॥ राजेन्द्र! जो मैं पहले आपको उज्ज्वल रेशमी वस्त्रोंसे आच्छादित देख चुकी हूँ, वही आज वल्कल-वस्त्र पहने देखती हूँ ॥ १४ ॥