भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 2095, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 2095

युधिष्ठिर बोले—माताका गौरव पृथ्वीसे भी अधिक है। पिता आकाशसे भी ऊँचा है। मन वायुसे भी तेज चलनेवाला है और चिन्ता तिनकोंसे भी अधिक असंख्य एवं अनन्त है ॥ ६० ॥

यक्ष उवाच
किंस्वित् सुप्तं न निमिषति किंस्विज्जातं न चोपति ।
कस्यस्विद्धृदयं नास्ति किंस्विद् वेगेन वर्धते ॥ ६१ ॥
यक्षने पूछा—कौन सोनेपर भी आँखें नहीं मूँदता? उत्पन्न होकर भी कौन चेष्टा नहीं करता? किसमें हृदय नहीं है? और कौन वेगसे बढ़ता है ॥ ६१ ॥

युधिष्ठिर उवाच
मत्स्यः सुप्तो न निमिषत्यण्डं जातं न चोपति ।
अश्मनो हृदयं नास्ति नदी वेगेन वर्धते ॥ ६२ ॥
युधिष्ठिर बोले—मछली सोनेपर भी आँखें नहीं मूँदती, अण्डा उत्पन्न होकर भी चेष्टा नहीं करता, पत्थरमें हृदय नहीं है और नदी वेगसे बढ़ती है ॥ ६२ ॥

यक्ष उवाच
किंस्वित् प्रवसतो मित्रं किंस्विन्मित्रं गृहे सतः ।
आतुरस्य च किं मित्रं किंस्विन्मित्रं मरिष्यतः ॥ ६३ ॥
यक्षने पूछा—प्रवासी (परदेशके यात्री)-का मित्र कौन है? गृहवासी (गृहस्थ)-का मित्र कौन है? रोगीका मित्र कौन है? और मृत्युके समीप पहुँचे हुए पुरुषका मित्र कौन है? ॥ ६३ ॥

युधिष्ठिर उवाच
सार्थः प्रवसतो मित्रं भार्या मित्रं गृहे सतः ।
आतुरस्य भिषङ्मित्रं दानं मित्रं मरिष्यतः ॥ ६४ ॥
युधिष्ठिर बोले—सहयात्रियोंका समुदाय अथवा साथमें यात्रा करनेवाला साथी ही प्रवासीका मित्र है, पत्नी गृहवासीका मित्र है, वैद्य रोगीका मित्र है और दान मुमूर्षु (अर्थात् मरनेवाले) मनुष्यका मित्र है ॥ ६४ ॥

यक्ष उवाच
कोऽतिथिः सर्वभूतानां किंस्विद् धर्मं सनातनम् ।
अमृतं किंस्विद् राजेन्द्र किंस्वित् सर्वमिदं जगत् ॥ ६५ ॥
यक्षने पूछा—राजेन्द्र! समस्त प्राणियोंका अतिथि कौन है? सनातन धर्म क्या है? अमृत क्या है? और यह सारा जगत् क्या है? ॥ ६५ ॥

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