महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवैशम्पायन उवाच
इत्युक्त्वा दुःखशोकार्तः शुचिर्धर्मसुतस्तदा । सम्मूच्छितोऽभवद् राजा साश्रुकण्ठो युधिष्ठिरः ॥ ९ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! ऐसा कहकर पवित्र अन्तःकरणवाले धर्मनन्दन राजा युधिष्ठिर दुःख और शोकसे आतुर होकर मूर्च्छित हो गये। उनके नेत्रोंसे आँसुओंकी धारा बह रही थी और कण्ठ अवरुद्ध हो गया था ॥ ९ ॥
तमथाश्वासयन् सर्वे ब्राह्मणा भ्रातृभिः सह । अथ धौम्योऽब्रवीद् वाक्यं महार्थं नृपतिं तदा ॥ १० ॥ उस समय उनके भाइयोंसहित समस्त ब्राह्मणोंने उन्हें आश्वासन दिया। तत्पश्चात् महर्षि धौम्यने राजा युधिष्ठिरसे यह गम्भीर अर्थयुक्त वचन कहा— ॥ १० ॥
राजन् विद्वान् भवान् दान्तः सत्यसंधो जितेन्द्रियः । नैवंविधाः प्रमुह्यन्ते नराः कस्याञ्चिदापदि ॥ ११ ॥ ‘राजन्! आप विद्वान्, मनको वशमें रखनेवाले, सत्यप्रतिज्ञ और जितेन्द्रिय हैं। आप-जैसे मनुष्य किसी भी आपत्तिमें मोहित नहीं होते अर्थात् अपना धैर्य और विवेक नहीं खोते हैं ॥ ११ ॥
देवैरप्यापदः प्राप्ताश्छन्नैश्च बहुशस्तथा । तत्र तत्र सपत्नानां निग्रहार्थं महात्मभिः ॥ १२ ॥ ‘महामना देवताओंको भी जहाँ-तहाँ शत्रुओंके निग्रहके लिये अनेक बार छिपकर रहना और विपत्तियोंको भोगना पड़ा है ॥ १२ ॥
इन्द्रेण निषधान् प्राप्य गिरिप्रस्थाश्रमे तदा । छन्नेनोष्या कृतं कर्म द्विषतां च विनिग्रहे ॥ १३ ॥ ‘देवराज इन्द्र शत्रुओंका दमन करनेके लिये गुप्तरूपसे निषधदेशमें गये और गिरिप्रस्थाश्रममें छिपे रहकर उन्होंने अपना कार्य सिद्ध किया ॥ ५३ ॥
विष्णुनाश्वशिरः प्राप्य तथादित्यां निवत्स्यता । गर्भे वधार्थं दैत्यानामज्ञातेनोषितं चिरम् ॥ १४ ॥ ‘भगवान् विष्णु भी दैत्योंका वध करनेके लिये हयग्रीवस्वरूप धारण करके अज्ञातभावसे अदितिके गर्भमें दीर्घकालतक रहे हैं ॥ १४ ॥
प्राप्य वामनरूपेण प्रच्छन्नं ब्रह्मरूपिणा । बलेर्यथा हृतं राज्यं विक्रमैस्तच्च ते श्रुतम् ॥ १५ ॥ ‘उन्होंने ही ब्राह्मणवेषमें वामनरूप धारण करके अपने तीन पगोंद्वारा जिस प्रकार छिपे तौरपर राजा बलिका राज्य हर लिया था, वह सब तो तुमने सुना ही होगा ॥