भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 2124, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 2124

मैं आपसे निवास करनेयोग्य कुछ रमणीय एवं गुप्त राष्ट्रोंके नाम बतलाऊँगा, उनमेंसे किसीको आप स्वयं ही अपनी रुचिके अनुसार चुन लीजिये ।। १०-११ ।। सन्ति रम्या जनपदा बह्वन्नाः परितः कुरून् । पाञ्चालाश्चेदिमत्स्याश्च शूरसेनाः पटच्चराः ।। १२ ।। दशार्णा नवराष्ट्राश्च मल्लाः शाल्वा युगन्धराः । कुन्तिराष्ट्रं च विपुलं सुराष्ट्रावन्तयस्तथा ।। १३ ।। कुरुदेशके चारों ओर बहुत-से सुरम्य जनपद हैं, जहाँ बहुत अन्न होता है। उनके नाम ये हैं—पांचाल, चेदि, मत्स्य, शूरसेन, पटच्चर, दशार्ण, नवराष्ट्र, मल्ल, शाल्व, युगन्धर, विशाल कुन्तिराष्ट्र, सौराष्ट्र तथा अवन्ती ।। १२-१३ ।। एतेषां कतमो राजन् निवासस्तव रोचते । यत्र वत्स्यामहे राजन् संवत्सरमिमं वयम् ।। १४ ।। राजन्! इनमेंसे कौन-सा राष्ट्र आपको निवास करनेके लिये पसंद है? जिसमें हम सब लोग इस वर्ष निवास करें ।। १४ ।।

युधिष्ठिर उवाच

श्रुतमेतन्महाबाहो यथा स भगवान् प्रभुः । अब्रवीत् सर्वभूतेशस्तत् तथा न तदन्यथा ।। १५ ।। **युधिष्ठिरने कहा—**महाबाहो! तुम्हारी यह बात मैंने ध्यानसे सुनी है। सम्पूर्ण भूतोंके अधीश्वर और प्रभावशाली भगवान् धर्मने हमारे लिये जैसा आदेश दिया है, वह सब वैसा ही होगा। उसके विपरीत कुछ नहीं होगा ।। १५ ।। अवश्यं त्वेव वासार्थं रमणीयं शिवं सुखम् । सम्मन्त्र्य सहितैः सर्वैर्वस्तव्यमकुतोभयैः ।। १६ ।। तथापि हम सब लोगोंको आपसमें सलाह करके अवश्य ही अपने रहनेके लिये कोई परम सुन्दर, कल्याणकारी तथा सुखद स्थान चुन लेना चाहिये, जहाँ हम निर्भय होकर रह सकें ।। १६ ।। मत्स्यो विराटो बलवानभिरक्तोऽथ पाण्डवान् । धर्मशीलो वदान्यश्च वृद्धश्च सततं प्रियः ।। १७ ।। [तुम्हारे बताये हुए देशोंमेंसे] मत्स्यदेशके राजा विराट बहुत बलवान् हैं और पाण्डवोंके प्रति उनका अनुराग भी है; साथ ही वे स्वभावतः धर्मात्मा, वृद्ध, उदार तथा हमें सदैव प्रिय हैं ।। १७ ।। विराटनगरे तात संवत्सरमिमं वयम् । कुर्वन्तस्तस्य कर्माणि विहरिष्याम भारत ।। १८ ।।

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