महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयो न यानं न पर्यङ्कं न पीठं न गजं रथम् । आरोहेत् सम्मतोऽस्मीति स राजवसतिं वसेत् ॥ १४ ॥ जो 'मैं राजाका प्रिय व्यक्ति हूँ', यों मानकर कभी राजाकी सवारी, पलंग, पादुका, हाथी एवं रथ आदिपर नहीं चढ़ता है, वही राजाके घरमें कुशलपूर्वक रह सकता है ॥ १४ ॥
यत्र यत्रैनमासीनं शङ्केरन् दुष्टचारिणः । न तत्रोपविशेद् यो वै स राजवसतिं वसेत् ॥ १५ ॥ जिन-जिन स्थानोंपर बैठनेसे दुराचारी मनुष्य संदेह करते हों, वहाँ-वहाँ जो कभी नहीं बैठता, वही राजभवनमें रह सकता है ॥ १५ ॥
न चानुशिष्याद् राजानमपृच्छन्तं कदाचन । तूष्णीं त्वेनमुपासीत काले समभिपूजयेत् ॥ १६ ॥ बिना पूछे राजाको कभी कर्तव्यका उपदेश न दे। मौनभावसे ही उसकी सेवा करे और उपयुक्त अवसरपर राजाकी प्रशंसा भी करे ॥ १६ ॥
असूयन्ति हि राजानो जनाननृतवादिनः । तथैव चावमन्यन्ते मन्त्रिणं वादिनं मृषा ॥ १७ ॥