महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2142, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंसंवर्णयेत् तदेवास्य प्रियादपि हितं भवेत् ॥ २४ ॥ कर्तव्य और अकर्तव्यके निर्णयके सभी अवसरोंपर हितकारक और प्रिय वचन कहे। यदि दोनों सम्भव न हों, तो प्रिय वचनका त्याग करके भी जो हितकारक हो, वही बात कहे (हितविरोधी प्रिय वचन कदापि न कहे) ॥ २४ ॥
अनुकूलो भवेच्चास्य सर्वार्थेषु कथासु च । अप्रियं चाहितं यत् स्यात् तदस्मै नानुवर्णयेत् ॥ २५ ॥ सभी विषयों तथा सब बातोंमें राजाके अनुकूल रहे। कथावार्तामें भी राजाके सामने ऐसी बातोंकी बार-बार चर्चा न करे, जो उसे अप्रिय एवं अहितकर प्रतीत होती हों ॥ २५ ॥
नाहमस्य प्रियोऽस्मीति मत्वा सेवेत पण्डितः । अप्रमत्तश्च सततं हितं कुर्यात् प्रियं च यत् ॥ २६ ॥ विद्वान् पुरुष 'मैं राजाका प्रिय व्यक्ति नहीं हूँ', ऐसा मानता हुआ सदा सावधान रहकर उसकी सेवा करे। राजाके लिये जो हितकर और प्रिय हो, वही कार्य करे ॥ २६ ॥
नास्यानिष्टानि सेवेत नाहितैः सह संवदेत् । स्वस्थानान्न विकम्पेत स राजवसतिं वसेत् ॥ २७ ॥ जो चीज राजाको पसंद न हो, उसका कदापि सेवन न करे। उसके शत्रुओंसे बातचीत न करे और अपने स्थानसे कभी विचलित न हो। ऐसा बर्ताव करनेवाला मनुष्य ही राजाके यहाँ सकुशल रह सकता है ॥ २७ ॥
दक्षिणं वाथ वामं वा पार्श्वमासीत पण्डितः । रक्षिणां ह्यात्तशस्त्राणां स्थानं पश्चात् विधीयते ॥ २८ ॥ विद्वान् पुरुषको चाहिये कि वह राजाके दाहिने या बायें भागमें बैठे; क्योंकि राजाके पीछे अस्त्र-शस्त्रधारी अंगरक्षक सैनिकोंका स्थान होता है ॥ २८ ॥
नित्यं हि प्रतिषिद्धं तु पुरस्तादासनं महत् । न च संदर्शने किञ्चित् प्रवृत्तमपि संजयेत् ॥ २९ ॥ राजाके सामने किसीके लिये भी ऊँचा आसन लगाना सर्वथा निषिद्ध है। उसकी आँखोंके सामने यदि कोई पुरस्कार-वितरण या वेतनदान आदिका कार्य हो रहा हो, तो उसमें बिना बुलाये स्वयं पहले लेनेकी चेष्टा नहीं करनी चाहिये ॥ २९ ॥
अपि ह्येतद् दरिद्राणां व्यलीकस्थानमुत्तमम् । न मृषाभिहितं राज्ञां मनुष्येषु प्रकाशयेत् ॥ ३० ॥ क्योंकि ऐसी ढिठाई तो दरिद्रोंको भी बहुत अप्रिय जान पड़ती है; फिर राजाओंकी तो बात ही क्या है? राजाओंकी किसी झूठी बातको दूसरे मनुष्योंके सामने प्रकाशित न करें ॥ ३० ॥
असूयन्ति हि राजानो नराननृतवादिनः । तथैव चावमन्यन्ते नरान् पण्डितमानिनः ॥ ३१ ॥