भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 2144, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 2144

है, वही राजाके यहाँ सुखपूर्वक रह सकता है ॥ ३८ ॥ राजानं राजपुत्रं वा संवर्णयति यः सदा । अमात्यः पण्डितो भूत्वा स चिरं तिष्ठते प्रियः ॥ ३९ ॥ जो बुद्धिमान् सचिव सदा राजा अथवा राजकुमारकी प्रशंसा करता रहता है, वही राजाके यहाँ उसका प्रीतिपात्र होकर दीर्घकालतक टिक सकता है ॥ ३९ ॥ प्रगृहीतश्च योऽमात्यो निगृहीतस्त्वकारणैः । न निर्वदति राजानं लभते सम्पदं पुनः ॥ ४० ॥ प्रत्यक्षं च परोक्षं च गुणवादी विचक्षणः । उपजीवी भवेद् राज्ञो विषये योऽपि वा भवेत् ॥ ४१ ॥ यदि कोई मन्त्री पहले राजाका कृपापात्र रहा हो और पीछे अकारण उसे दण्ड भोगना पड़ा हो, उस दशामें भी जो राजाकी निन्दा नहीं करता, वह पुनः अपने पूर्व वैभवको प्राप्त कर लेता है। जो बुद्धिमान् राजाके आश्रित रहकर जीवननिर्वाह अथवा उसके राज्यमें निवास करता है, उसे राजाके सामने अथवा पीठ पीछे भी उसके गुणोंकी ही चर्चा करनी चाहिये ॥ ४०-४१ ॥ अमात्यो हि बलाद् भोक्तुं राजानं प्रार्थयेत यः । न स तिष्ठेच्चिरं स्थानं गच्छेच्च प्राणसंशयम् ॥ ४२ ॥ जो मन्त्री राजाको बलपूर्वक अपने अधीन करना चाहता है, वह अधिक समयतक अपने पदपर नहीं टिक सकता। इतना ही नहीं, उसके प्राणोंपर भी संकट आ जाता है ॥ ४२ ॥ श्रेयः सदाऽऽत्मनो दृष्ट्वा परं राज्ञा न संवदेत् । विशेषयेच्च राजानं योग्यभूमिषु सर्वदा ॥ ४३ ॥ अपनी भलाई अथवा लाभ देखकर दूसरेको सदा राजाके साथ न मिलावे; न बातचीत करावे। उपयुक्त स्थान और अवसर देखकर सदा राजाकी विशेषता प्रकट करे ॥ ४३ ॥ अम्लानोबलवाञ्छूरश्छायेवानुगतः सदा । सत्यवादी मृदुर्दान्तः स राजवसतिं वसेत् ॥ ४४ ॥ जो उत्साहसम्पन्न, बुद्धि-बलसे युक्त, शूरवीर, सत्यवादी, कोमलस्वभाव और जितेन्द्रिय होकर सदा छायाकी भाँति राजाका अनुसरण करता है, वही राजदरबारमें टिक सकता है ॥ ४४ ॥ अन्यस्मिन् प्रेष्यमाणे तु पुरस्ताद् यः समुत्पतेत् । अहं किं करवाणीति स राजवसतिं वसेत् ॥ ४५ ॥ जब दूसरेको किसी कार्यके लिये भेजा जा रहा हो, उस समय जो स्वयं ही उठकर आगे जाय और पूछे—'मेरे लिये क्या आज्ञा है', वही राजभवनमें निवास कर सकता है ॥ ४५ ॥ आन्तरे चैव बाह्ये च राज्ञा यश्चाथ सर्वदा ।

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