महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 216, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंदण्डमर्हन्ति दुष्यन्ति दुष्टाश्चाप्यपकुर्वते ॥ १५ ॥ यदि उन्हें अपने स्वामीसे तनिक भी दण्ड नहीं मिलता तो वे सदा मौज उड़ाती हैं और आचारसे दूषित हो जाती हैं। दुष्टा होनेपर वे अपने स्वामीका अपकार भी कर बैठती हैं ॥ १५ ॥
एते चान्ये च बहवो नित्यं दोषाः क्षमावताम् । अथ वैरोचने दोषानिमान् विद्ध्यक्षमावताम् ॥ १६ ॥ सदा क्षमा करनेवाले पुरुषोंको ये तथा और भी बहुत-से दोष प्राप्त होते हैं। विरोचनकुमार! अब क्षमा न करनेवालोंके दोषोंको सुनो ॥ १६ ॥
अस्थाने यदि वा स्थाने सततं रजसाऽऽवृतः । क्रुद्धो दण्डान् प्रणयति विविधान् स्वेन तेजसा ॥ १७ ॥ क्रोधी मनुष्य रजोगुणसे आवृत होकर योग्य या अयोग्य अवसरका विचार किये बिना ही अपने उत्तेजित स्वभावसे लोगोंको नाना प्रकारके दण्ड देता रहता है ॥ १७ ॥
मित्रैः सह विरोधं च प्राप्नुते तेजसाऽऽवृतः । आप्नोति द्वेष्यतां चैव लोकात् स्वजनतस्तथा ॥ १८ ॥ तेज (उत्तेजना)-से व्याप्त मनुष्य मित्रोंसे विरोध पैदा कर लेता है तथा साधारण लोगों और स्वजनोंका द्वेषपात्र बन जाता है ॥ १८ ॥
सोऽवमानादर्थहानिमुपालम्भमनादरम् । संतापद्वेषमोहांश्च शत्रूंश्च लभते नरः ॥ १९ ॥ वह मनुष्य दूसरोंका अपमान करनेके कारण सदा धनकी हानि उठाता है। उपालम्भ सुनता और अनादर पाता है। इतना ही नहीं, वह संताप, द्वेष, मोह तथा नये-नये शत्रु पैदा कर लेता है ॥ १९ ॥
क्रोधाद् दण्डान्मनुष्येषु विविधान् पुरुषोऽनयात् । भ्रश्यते शीघ्रमैश्वर्यात् प्राणेभ्यः स्वजनादपि ॥ २० ॥ मनुष्य क्रोधवश अन्यायपूर्वक दूसरे लोगोंपर नाना प्रकारके दण्डका प्रयोग करके अपने ऐश्वर्य, प्राण और स्वजनोंसे भी हाथ धो बैठता है ॥ २० ॥
योपकर्तॄंश्च हर्तॄंश्च तेजसैवोपगच्छति । तस्मादुद्विजते लोकः सर्पाद् वेश्मगतादिव ॥ २१ ॥ जो उपकारी मनुष्यों और चोरोंके साथ भी उत्तेजनायुक्त बर्ताव ही करता है, उससे सब लोग उसी प्रकार उद्विग्न होते हैं, जैसे घरमें रहनेवाले सर्पसे ॥ २१ ॥
यस्मादुद्विजते लोकः कथं तस्य भवो भवेत् । अन्तरं तस्य दृष्ट्वैव लोको विकुरुते ध्रुवम् ॥ २२ ॥ जिससे सब लोग उद्विग्न होते हैं, उसे ऐश्वर्यकी प्राप्ति कैसे हो सकती है? उसका थोड़ा-सा भी छिद्र देखकर लोग निश्चय ही उसकी बुराई करने लगते हैं ॥ २२ ॥