भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 218

अजानता भवेत् कश्चिदपराधः कृतो यदि । क्षन्तव्यमेव तस्याहुः सुपरीक्ष्य परीक्षया ॥ ३० ॥ अच्छी तरह जाँच-पड़ताल करनेपर यदि यह सिद्ध हो जाय कि अमुक अपराध अनजानमें ही हो गया है, तो उसे क्षमाके ही योग्य बताया गया है ॥ ३० ॥

मृदुना दारुणं हन्ति मृदुना हन्त्यदारुणम् । नासाध्यं मृदुना किंचित् तस्मात् तीव्रतरं मृदु ॥ ३१ ॥ मनुष्य कोमलभाव (सामनीति)-के द्वारा उग्र स्वभाव तथा शान्त स्वभावके शत्रु‌का भी नाश कर देता है; मृदुतासे कुछ भी असाध्य नहीं है। अतः मृदुतापूर्ण नीतिको तीव्रतर (उत्तम) समझे ॥ ३१ ॥

देशकालौ तु सम्प्रेक्ष्य बलाबलमथात्मनः । नादेशकाले किंचित् स्याद् देशकालौ प्रतीक्षताम् । तथा लोकभयाच्चैव क्षन्तव्यमपराधिनः ॥ ३२ ॥ देश, काल तथा अपने बलाबलका विचार करके ही मृदुता (सामनीति)-का प्रयोग करना चाहिये। अयोग्य देश अथवा अनुपयुक्त कालमें उसके प्रयोगसे कुछ भी सिद्ध नहीं हो सकता; अतः उपयुक्त देश, कालकी प्रतीक्षा करनी चाहिये। कहीं लोकके भयसे भी अपराधीको क्षमादान देनेकी आवश्यकता होती है ॥ ३२ ॥

एत एवंविधाः कालाः क्षमायाः परिकीर्तिताः । अतोऽन्यथानुवर्तत्सु तेजसः काल उच्यते ॥ ३३ ॥ इस प्रकार ये क्षमाके अवसर बताये गये हैं। इनके विपरीत बर्ताव करनेवालोंको राहपर लानेके लिये तेज (उत्तेजनापूर्ण बर्ताव)-का अवसर कहा गया है ॥ ३३ ॥

तदहं तेजसः कालं तव मन्ये नराधिप । धार्तराष्ट्रेषु लुब्धेषु सततं चापकारिषु ॥ ३४ ॥ (द्रौपदी कहती है—) नरेश्वर! धृतराष्ट्रके पुत्र लोभी तथा सदा आपका अपकार करनेवाले हैं; अतः उनके प्रति आपके तेजके प्रयोगका यह अवसर आया है, ऐसा मेरा मत है ॥ ३४ ॥

न हि कश्चित् क्षमाकालो विद्यतेऽद्य कुरून् प्रति । तेजसश्चागते काले तेज उत्स्रष्टुमर्हसि ॥ ३५ ॥ कौरवोंके प्रति अब क्षमाका कोई अवसर नहीं है। अब तेज प्रकट करनेका अवसर प्राप्त है; अतः उनपर आपको अपने तेजका ही प्रयोग करना चाहिये ॥ ३५ ॥

मृदुर्भवत्यवज्ञातस्तीक्ष्णादुद्विजते जनः । काले प्राप्ते द्वयं चैतद् यो वेद स महीपतिः ॥ ३६ ॥ कोमलतापूर्ण बर्ताव करनेवालेकी सब लोग अवहेलना करते हैं और तीक्ष्ण स्वभाववाले पुरुषसे सबको उद्वेग प्राप्त होता है। जो उचित अवसर आनेपर इन दोनोंका