भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 2189, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 2189

सुतां च मे नर्तय याश्च तादृशीः ।

इदं तु ते कर्म समं न मे मतं

समुद्रनेमिं पृथिवीं त्वमर्हसि ।। १० ।।

विराट बोले—बृहन्नले! मैं तुम्हें अभीष्ट वर देता हूँ। तुम मेरी पुत्रीको तथा उसके समान

अवस्थावाली अन्य राजकुमारियोंको नृत्यकला सिखलाओ। परंतु मुझे यह कर्म तुम्हारे

योग्य नहीं जान पड़ता। तुम तो समुद्रसे घिरी हुई सम्पूर्ण पृथ्वीके शासक होने योग्य

हो ।। १० ।।

वैशम्पायन उवाच

बृहन्नलां तामभिवीक्ष्य मत्स्यराट्

कलासु नृत्येषु तथैव वादिते ।

सम्मन्त्र्य राजा विविधैः स्वमन्त्रिभिः

परीक्ष्य चैनं प्रमदाभिराशु वै ।। ११ ।।

अपुंस्त्वमप्यस्य निशम्य च स्थिरं

ततः कुमारीपुरमुत्ससर्ज तम् ।

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! तदनन्तर मत्स्यनरेशने बृहन्नलाकी गीत, नृत्य

और बाजे बजानेकी कलाओंमें परीक्षा करके अपने अनेक मन्त्रियोंसे यह सलाह ली कि

इसे अन्तःपुरमें रखना चाहिये या नहीं। फिर तरुणी स्त्रियोंद्वारा शीघ्र ही उनके नपुंसकत्वकी

जाँच करायी। जब सब तरहसे उनका नपुंसक होना ठीक प्रमाणित हो गया, तब यह सुन-

समझकर उन्होंने बृहन्नलाको कन्याके अन्तःपुरमें जानेकी आज्ञा दी ।। ११ १/२ ।।

स शिक्षयामास च गीतवादितं

सुतां विराटस्य धनंजयः प्रभुः ।। १२ ।।

सखीश्च तस्याः परिचारिकास्तथा

प्रियश्च तासां स बभूव पाण्डवः ।। १३ ।।

तथा स सत्रेण धनंजयो वसन्

प्रियाणि कुर्वन् सह ताभिरात्मवान् ।

तथा च तं तत्र न जज्ञिरे जना

बहिश्चरा वाप्यथ चान्तरेचराः ।। १४ ।।

शक्तिशाली अर्जुन विराटकन्या उत्तरा, उसकी सखियों तथा सेविकाओंको भी गीत,

वाद्य एवं नृत्यकलाकी शिक्षा देने लगे। इससे वे उन सबके प्रिय हो गये। छद्मवेशमें

कन्याओंके साथ रहते हुए भी अर्जुन अपने मनको सदा पूर्णरूपसे वशमें रखते और उन

सबको प्रिय लगनेवाले कार्य करते थे। इस रूपमें वहाँ रहते हुए अर्जुनको बाहर अथवा

अन्तःपुरके कोई भी मनुष्य पहचान न सके ।। १२—१४ ।।

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