महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2197, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्यूतशालामें पासोंको अपने इच्छानुसार फेंकते हुए राजा आदिको जूआ खेलाया करते थे ।। ३—५ ।। अज्ञातं च विराट्स्य विजित्य वसु धर्मराट् । भ्रातृभ्यः पुरुषव्याघ्रो यथार्हं सम्प्रयच्छति ।। ६ ।। 'पुरुषसिंह धर्मराज युधिष्ठिर जूएमं धन जीतकर अपने भाइयोंको यथायोग्य बाँट देते थे।' इसका राजा विराटको भी पता नहीं लगता था ।। ६ ।। भीमसेनोऽपि मांसानि भक्ष्याणि विविधानि च । अतिसृष्टानि मत्स्येन विक्रीणीते युधिष्ठिरे ।। ७ ।। भीमसेन भी नाना प्रकारके भक्ष्य-भोज्य पदार्थ, जो मत्स्यनरेशद्वारा उन्हें पुरस्काररूपमें प्राप्त होते, बेच देते और उससे मिला हुआ धन युधिष्ठिरकी सेवामें अर्पित करते थे ।। ७ ।। वासांसि परिजीर्णानि लब्धान्यन्तःपुरेऽर्जुनः । विक्रीणानश्च सर्वेभ्यः पाण्डवेभ्यः प्रयच्छति ।। ८ ।। अर्जुनको अन्तःपुरमें जो पुराने उतारे हुए बहुमूल्य वस्त्र प्राप्त होते, उन्हें वे बेचते और बेचनेसे मिला हुआ मूल्य सब पाण्डवोंको देते थे ।। ८ ।। सहदेवोऽपि गोपानां वेषमास्थाय पाण्डवः । दधि क्षीरं घृतं चैव पाण्डवेभ्यः प्रयच्छति ।। ९ ।। पाण्डुनन्दन सहदेव भी ग्वालोंका वेश धारणकर पाण्डवोंको दही, दूध और घी दिया करते थे ।। ९ ।। नकुलोऽपि धनं लब्ध्वा कृते कर्मणि वाजिनाम् । तुष्टे तस्मिन् नरपतौ पाण्डवेभ्यः प्रयच्छति ।। १० ।। नकुल भी घोड़ोंके शिक्षणका कार्य करके महाराज विराटके संतुष्ट होनेपर उनसे पुरस्कारस्वरूप जो धन पाते, उसे सब पाण्डवोंको बाँट दिया करते थे ।। १० ।। कृष्णा तु सर्वान् भर्तूंस्तान् निरीक्षन्ती तपस्विनी । यथा पुनरविज्ञाता तथा चरति भामिनी ।। ११ ।। तपस्विनी एवं सुन्दरी द्रौपदी भी उन सब पतियोंकी देखभाल करती हुई ऐसा बर्ताव करती, जिससे फिर कोई उसे पहचान न सके ।। ११ ।। एवं सम्पादयन्तस्ते तदान्योन्यं महारथाः । विराटनगरे चेरुः पुनर्गर्भधृता इव ।। १२ ।। इस प्रकार एक-दूसरेका सहयोग करते हुए वे महारथी पाण्डव विराटनगरमें बहुत छिपकर रहते थे; मानो पुनः माताके गर्भमें निवास कर रहे हों ।। १२ ।। साशङ्का धार्तराष्ट्रस्य भयात् पाण्डुसुतास्तदा ।