भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 2199

जब वे सभी मल्ल उदासीन हो हिम्मत हार बैठे, तब मत्स्यनरेशने अपने रसोइयेसे उस पहलवानको लड़ानेका निश्चय किया ॥ १९ ॥ नोद्यमानस्तदा भीमो दुःखैनावाकरोन्मतिम् । न हि शक्नोति विवृते प्रत्याख्यातुं नराधिपम् ॥ २० ॥ उस समय राजासे प्रेरित होनेपर भीमसेनने [पहचाने जानेके भयसे] दुःखी होकर ही उससे लड़नेका विचार किया। वे राजाकी बातको प्रकटरूपमें टाल नहीं सकते थे ॥ २० ॥ ततः स पुरुषव्याघ्रः शार्दूलशिथिलश्वरन् । प्रविवेश महारङ्गं विराटमभिपूजयन् ॥ २१ ॥ तदनन्तर पुरुषसिंह भीमने सिंहके समान धीमी चालसे चलते हुए राजा विराटका मान रखनेके लिये उस विशाल रंगभूमिमें प्रवेश किया ॥ २१ ॥ बबन्ध कक्षां कौन्तेयस्ततः संहर्षयन् जनम् । ततस्तु वृत्रसंकाशं भीमो मल्लं समाह्वयत् ॥ २२ ॥ जीमूतं नाम तं तत्र मल्लं प्रख्यातविक्रमम् । फिर लोगोंमें हर्षका संचार करते हुए उन्होंने लँ गोट बाँधा और उस प्रसिद्ध पराक्रमी जीमूत नामक मल्लको, जो वृत्रासुरके समान दिखायी देता था, युद्धके लिये ललकारा ॥ २२ ½ ॥ तावुभौ सुमहोत्साहावुभौ भीमपराक्रमौ ॥ २३ ॥ मत्ताविव महाकायौ वारणौ षष्टिहायनौ । वे दोनों बड़े उत्साहमें भरे थे। दोनों ही प्रचण्ड पराक्रमी थे, ऐसा लगता था मानो साठ वर्षके दो मतवाले एवं विशालकाय गजराज एक-दूसरेसे भिड़नेको उद्यत हों ॥ २३ ½ ॥ ततस्तौ नरशार्दूलौ बाहुयुद्धं समीयुतुः ॥ २४ ॥ वीरौ परमसंहृष्टावन्योन्यजयकाङ्क्षिणौ । आसीत् सुभीमः सम्पातो वज्रपर्वतयोरिव ॥ २५ ॥ अत्यन्त हर्षमें भरकर एक-दूसरेको जीत लेनेकी इच्छावाले वे दोनों नरश्रेष्ठ वीर बाहुयुद्ध करने लगे। उस समय उन दोनोंमें बड़ी भयंकर भिड़न्त हुई। उनके परस्परके आघातसे इस प्रकार चटचट शब्द होने लगा, मानो वज्र और पर्वत एक-दूसरेसे टकरा गये हों ॥ उभौ परमसंहृष्टौ बलेनातिबलावुभौ । अन्योन्यस्यान्तरं प्रेप्सू परस्परजयैषिणौ ॥ २६ ॥ दोनों अत्यन्त प्रसन्न थे। बलकी दृष्टिसे दोनों ही अत्यन्त बलशाली थे और एक-दूसरेपर चोट करनेका अवसर देखते हुए विजयके अभिलाषी हो रहे