महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2214, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंतथापि तेषां न विमोक्षमर्हसि
प्रमथिनो देवसुता हि खेचराः ॥ ५० ॥
सूतपुत्र ! मुझपर कुदृष्टि डालकर पृथ्वीके भीतर (पातालमें) घुस जा, आकाशमें उड़ जा
अथवा समुद्रके उस पार भाग जा, तथापि मेरे पतियोंके हाथसे तू छूट नहीं सकता; क्योंकि
मेरे पति देवताओंके पुत्र तथा आकाशमें विचरनेवाले हैं। वे अपने शत्रुओंको मथ डालनेकी
शक्ति रखते हैं ॥ ५० ॥
(मां हि त्वमवमन्वानः सूतपुत्र विनङ्क्ष्यसि ।
आशु चाद्यैव नचिरात् सपुत्रः सहबान्धवः ॥
सूतपुत्र ! तू मेरा अपमान कर रहा है; अतः पुत्रों तथा बन्धु-बान्धवोंसहित तू आज ही
शीघ्र नष्ट हो जायगा। तेरे विनाशमें अब विलम्ब नहीं है।
दुर्लभामभिमन्वानो मां वीरैरभिरक्षिताम् ।
पतिष्यस्यवशस्तूर्णं वृन्तात् तालफलं यथा ॥
मैं वीर गन्धर्वोंद्वारा सुरक्षित होनेके कारण तेरे लिये सर्वथा दुर्लभ हूँ। मेरा अपमान
करनेसे शीघ्र ही विवशतापूर्वक तेरा उसी प्रकार पतन होगा, जैसे ताड़का फल अपने
मूलस्थानसे नीचे गिरता है।
यो मामज्ञाय कामार्तः अबद्धानि प्रभाषसे ।
अशक्तस्तु पुमाञ्छैलं न लङ्घयितुमर्हति ॥
तू मुझे नहीं जानता, इसीलिये कामातुर होकर बहकी-बहकी बातें कर रहा है। परंतु
कोई असमर्थ पुरुष कितना ही प्रयत्न करे, वह पर्वतको नहीं लाँघ सकता।
दिशः प्रपन्नो गिरिगह्वराणि वा
गुहां प्रविष्टोऽन्तरितोऽपि वा क्षितेः ॥
जुह्वन् जपन् वा प्रपतन् गिरेस्तटाद्-
हुताशनादित्यगतिं गतोऽपि वा ।
भार्याभिमन्ता पुरुषो महात्मनां
न जातु मुच्येत कथंचनाहतः ॥
चाहे कोई सम्पूर्ण दिशाओंकी शरण लेता फिरे, पर्वतकी बड़ी-बड़ी कन्दराओं अथवा
दुर्गम गुफाओंमें छिप जाय या पृथ्वीके अंदर ही रहने लगे, होम और जपमें संलग्न रहे,
पर्वतके शिखरसे कूद पड़े, जलती आग अथवा सूर्यकी प्रचण्ड रश्मियोंकी शरण ले तो भी
महात्मा गन्धर्वोंकी पत्नीका अपमान करनेवाला पुरुष कभी किसी तरह भी उनके हाथसे
जीवित नहीं बच सकता।
मोघं तवेदं वचनं भविष्यति
प्रतोलनं वा तुलया महागिरेः ।
हुताशनं प्रज्वलितं महावने