महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएवमेषा ममाचष्टे तथा प्रथमसंगमे । तथैव गजनासोरुः सत्यमाह ममान्तिके ॥ ते हि क्रुद्धा महात्मानो नाशयेयुर्हि जीवितम् । इसने यह बात मुझसे उसी समय जब कि मेरी इससे पहले-पहल भेंट हुई थी, बता दी थी। इसी प्रकार हाथीकी सूँड़के समान जाँघोंवाली इस सुन्दरीने मेरे निकट यह सत्य ही कहा है कि यदि किसीने मेरा अपमान किया, तो मेरे महात्मा पति कुपित होकर उसके जीवनको ही नष्ट कर देंगे।
राजा चैव समीक्ष्यैनां सम्मोहं गतवानिह ॥ मया च सत्यवचनैरनुनीतो महीपतिः । राजा भी इसे यहाँ देखकर मोहित हो गये थे, तब मैंने इसकी कही हुई सच्ची बातें बताकर उन्हें किसी प्रकार समझा-बुझाकर शान्त किया।
सोऽप्येनामनिशं दृष्ट्वा मनसैवाभ्यनन्दत ॥ भयाद् गन्धर्वमुख्यानां जीवितस्योपघातिनाम् । मनसापि ततस्त्वेनां न चिन्तयति पार्थिवः ॥ तबसे वे भी सदा इसे देखकर मन-ही-मन इसका अभिनन्दन करते हैं। जीवनका विनाश करनेवाले उन श्रेष्ठ गन्धर्वोंके भयसे महाराज कभी मनसे भी इसका चिन्तन नहीं करते हैं।
ते हि क्रुद्धा महात्मानो गरुडानिलतेजसः । दहेयुरपि लोकांस्त्रीन् युगान्तेष्विव भास्कराः ॥ वे महात्मा गन्धर्व गरुड़ और वायुके समान तेजस्वी हैं। वे कुपित होनेपर प्रलयकालके सूर्योंकी भाँति तीनों लोकोंको दग्ध कर सकते हैं।
सैरन्ध्रया ह्येतदाख्यातं मम तेषां महद् बलम् । तव चाहमिदं गुह्यं स्नेहादाख्यामि बन्धुवत् ॥ सैरन्ध्रीने स्वयं ही मुझसे उनके महान् बलका परिचय दिया है। भ्रातृस्नेहके कारण मैंने तुमसे यह गोपनीय बात भी बता दी है।
मा गमिष्यसि वै कृच्छ्रां गतिं परमदुर्गमाम् । बलिनस्ते रुजं कुर्युः कुलस्य च धनस्य च ॥ इसे ध्यानमें रखनेसे तुम अत्यन्त दुःखदायिनी संकटपूर्ण परिस्थितिमें नहीं पड़ोगे। गन्धर्वलोग बलवान् हैं। वे तुम्हारे कुल और सम्पत्तिका भी नाश कर सकते हैं।
तस्मान्नास्यां मनः कर्तुं यदि प्राणाः प्रियास्तव । मा चिन्तयेथा मा गास्त्वं मत्प्रियं च यदिच्छसि ॥ इसलिये यदि तुम्हें अपने प्राण प्रिय हैं और यदि तुम मेरा भी प्रिय करना चाहते हो तो इस सैरन्ध्रीमें मन न लगाओ। उसका चिन्तन छोड़ दो और उसके पास कभी न जाओ।