महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 222, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्षन्तव्यं पुरुषेणाहूरापत्स्वपि विजानता ॥ १३ ॥ इसलिये बलवान् या निर्बल सभी विज्ञ मनुष्योंको सदा आपत्तिकालमें भी क्षमाभावका ही आश्रय लेना चाहिये ॥ १३ ॥
मन्योर्हि विजयं कृष्णे प्रशंसन्तीह साधवः । क्षमावतो जयो नित्यं साधोरिह सतां मतम् ॥ १४ ॥ कृष्णे! साधु पुरुष क्रोधको जीतनेकी ही प्रशंसा करते हैं। संतोंका यह मत है कि इस जगत्में क्षमाशील साधु पुरुषकी सदा जय होती है ॥ १४ ॥
सत्यं चानृततः श्रेयो नृशंस्याच्चानृशंसता । तमेवं बहुदोषं तु क्रोधं साधुविवर्जितम् ॥ १५ ॥ मादृशः प्रसृजेत् कस्मात् सुयोधनवधादपि । झूठसे सत्य श्रेष्ठ है। क्रूरतासे दयालुता श्रेष्ठ है, अतः दुर्योधन मेरा वध कर डाले तो भी इस प्रकार अनेक दोषोंसे भरे हुए और सत्पुरुषोंद्वारा परित्यक्त क्रोधका मेरे-जैसा पुरुष कैसे उपयोग कर सकता है? ॥ १५ १/२ ॥
तेजस्वीति यमाहुर्वै पण्डिता दीर्घदर्शिनः ॥ १६ ॥ न क्रोधोऽभ्यन्तरस्तस्य भवतीति विनिश्चितम् । दूरदर्शी विद्वान् जिसे तेजस्वी कहते हैं, उसके भीतर क्रोध नहीं होता; यह निश्चित बात है ॥ १६ १/२ ॥
यस्तु क्रोधं समुत्पन्नं प्रज्ञया प्रतिबाधते ॥ १७ ॥ तेजस्विनं तं विद्वांसो मन्यन्ते तत्त्वदर्शिनः । जो उत्पन्न हुए क्रोधको अपनी बुद्धिसे दबा देता है, उसे तत्त्वदर्शी विद्वान् तेजस्वी मानते हैं ॥ १७ १/२ ॥
क्रुद्धो हि कार्यं सुश्रोणि न यथावत् प्रपश्यति । नाकार्यं न च मर्यादां नरः क्रुद्धोऽनुपश्यति ॥ १८ ॥ सुन्दरी! क्रोधी मनुष्य किसी कार्यको ठीक-ठीक नहीं समझ पाता। वह यह भी नहीं जानता कि मर्यादा क्या है (अर्थात् क्या करना चाहिये) और क्या नहीं करना चाहिये ॥ १८ ॥
हन्त्यवध्यानपि क्रुद्धो गुरून् क्रुद्धस्तुदत्यपि । तस्मात् तेजसि कर्तव्यः क्रोधो दूरे प्रतिष्ठितः ॥ १९ ॥ क्रोधी मनुष्य अवध्य पुरुषोंका वध कर देता है। क्रोधी मनुष्य गुरुजनोंको कटु वचनोंद्वारा पीड़ा पहुँचाता है। इसलिये जिसमें तेज हो, उस पुरुषको चाहिये कि वह क्रोधको अपनेसे दूर रखे ॥ १९ ॥
दाक्ष्यं ह्यमर्षः शौर्यं च शीघ्रत्वमिति तेजसः । गुणा! क्रोधाभिभूतेन न शक्याः प्राप्तुमञ्जसा ॥ २० ॥