भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2221

**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! बहिनके वचनसे इस प्रकार आश्वासन मिलनेपर कीचक उस समय वहाँसे चला गया और घर जाकर उसने यथासमय चतुर रसोइयोंके द्वारा राजाओंके उपयोगमें आने योग्य उत्तम एवं परिष्कृत मदिरा मँगवायी और भाँति-भाँतिके अनेक विशिष्ट और साधारण भक्ष्य पदार्थ एवं परम उत्तम अन्न-पानकी तैयारी करायी।। ७-८।।

तस्मिन् कृते तदा देवी कीचकेनोपमन्त्रिता।
उसकी व्यवस्था हो जानेपर कीचकने सुदेष्णाको भोजनके लिये आमन्त्रित किया।। ८ ½ ।।

(त्वरावान् कालपाशेन कण्ठे बद्धः पशुर्यथा।
नावबुध्यत मूढात्मा मरणं समुपस्थितम्।।
मूढात्मा कीचक कण्ठमें कालपाशसे बँधे हुए पशुकी भाँति अपने निकट आयी हुई मृत्युको नहीं जान पाता था। वह द्रौपदीको पानेके लिये उतावला हो रहा था।

कीचक उवाच

मधु मद्यं बहुविधं भक्ष्याश्च विविधाः कृताः।
सुदेष्णे ब्रूहि सैरन्ध्रीं यथा सा मे गृहं व्रजेत्।।
**कीचक बोला—**सुदेष्णे! मैंने नाना प्रकारकी मीठी मदिरा मँगा ली है और विविध प्रकारकी रसोई भी तैयार कर ली है। अब तुम सैरन्ध्रीसे कह दो, जिससे वह मेरे घरमें पधारे।

केनचित् त्वद्य कार्येण त्वर शीघ्रं मम प्रियम्।।
अहं हि शरणं देवं प्रपद्ये वृषभध्वजम्।
समागमं मे सैरन्ध्र्या मरणं वा दिशेति वै।।
किसी कामके बहाने उसे जल्दी मेरे यहाँ भेजो। मेरा प्रिय कार्य सिद्ध करनेमें शीघ्रता करो। मैं भगवान् शंकरकी शरण लेकर यह प्रार्थना करता हूँ कि प्रभो! मुझे सैरन्ध्रीसे मिला दो अथवा मृत्यु प्रदान करो।

वैशम्पायन उवाच

सा तमाह विनिःश्वस्य प्रतिगच्छ स्वकं गृहम्।
एषाहमपि सैरन्ध्रीं सुरार्थं तूर्णमादिशे।।
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तब सुदेष्णा लंबी साँस खींचकर उससे बोली—'तुम अपने घर लौट जाओ। मैं सैरन्ध्रीको शीघ्र ही वहाँसे मदिरा ले आनेके लिये आज्ञा देती हूँ'।

एवमुक्तस्तु पापात्मा कीचकस्त्वरितः पुनः।
स्वगृहं प्राविशत् तूर्णं सैरन्ध्रीगतमानसः।।)