महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविवादेषु प्रवृत्तेषु समं कार्यानुदर्शिना । राज्ञा धर्मासनस्थेन जितौ लोकावुभावपि ॥ जो प्रियजनों तथा द्वेषपात्रोंमें भी समानभाव रखते हैं, प्रजाजनोंमें विवाद आरम्भ होनेपर जो राजा धर्मासनपर बैठकर समानभावसे प्रत्येक कार्यपर विचार करते हैं, वे दोनों लोकोंको जीत लेते हैं।
राजन् धर्मासनस्थोऽपि रक्ष मां त्वमनागसम् ॥ अहं त्वनपराध्यन्ती कीचकेन दुरात्मना । पश्यतस्ते महाराज हता पादेन दासवत् ॥ राजन्! आप धर्मके आसनपर बैठे हैं। मुझ निरपराध अबलाकी रक्षा कीजिये। महाराज! मैंने कोई अपराध नहीं किया है तो भी दुरात्मा कीचकने आपके देखते-देखते मुझको लात मारी है; मेरे साथ (खरीदे हुए) दासका-सा बर्ताव किया है।
मत्स्याधिप प्रजा रक्ष पिता पुत्रानिवौरसान् ॥ यस्त्वधर्मेण कार्याणि मोहात्मा कुरुते नृपः । अचिरात् तं दुरात्मानं वशे कुर्वन्ति शत्रवः ॥ मत्स्यराज! जैसे पिता अपने औरस पुत्रोंकी रक्षा करता है, उसी प्रकार आप अपने प्रजाजनोंका संरक्षण कीजिये। जो मोहमें डूबा हुआ राजा अधर्मयुक्त कार्य करता है, उस दुरात्माको उसके शत्रु शीघ्र ही वशमें कर लेते हैं।
मत्स्यानां कुलजस्त्वं हि तेषां सत्यं परायणम् । त्वं किलैवंविधो जातः कुले धर्मपरायणे ॥ आप मत्स्यकुलमें उत्पन्न हुए हैं। सत्य ही मत्स्यनरेशोंका महान् आश्रय रहा है। आप भी इस धर्मपरायण कुलमें ऐसे ही धर्मात्मा पैदा हुए हैं।
अतस्त्वामभिक्रन्दे शरणार्थं नराधिप । त्राहि मामद्य राजेन्द्र कीचकात् पापपूरुषात् ॥ अतः नरेश्वर! मैं आपसे शरण देनेके लिये रुदन करती हूँ। राजेन्द्र! आज मुझे इस पापी कीचकसे बचाइये।
अनाथामिह मां ज्ञात्वा कीचकः पुरुषाधमः । प्रहरत्येव नीचात्मा न तु धर्ममवेक्षते ॥ पुरुषाधम कीचक यहाँ मुझे असहाय जानकर मार रहा है। यह नीच अपने धर्मकी ओर नहीं देखता है।
अकार्याणामनारम्भात् कार्याणामनुपालनात् । प्रजासु ये सुवृत्तास्ते स्वर्गमायान्ति भूमिपाः ॥ जो भूमिपाल न करनेयोग्य कार्योंका आरम्भ नहीं करते, करनेयोग्य कर्त्तव्योंका निरन्तर पालन करते हैं और सदा प्रजाके साथ उत्तम बर्ताव करते हैं, वे स्वर्गलोकमें जाते हैं।