महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहन्युश्च पतयो भार्याः पतीन् भार्यास्तथैव च ।। २८ ।। पिता पुत्रोंको मारेंगे और पुत्र पिताको, पति पत्नियोंको मारेंगे और पत्नियाँ पतिको ।। २८ ।।
एवं संकुपिते लोके शमः कृष्णे न विद्यते । प्रजानां संधिमूलं हि शमं विद्धि शुभानने ।। २९ ।। कृष्णे! इस प्रकार सम्पूर्ण जगत्के क्रोधका शिकार हो जानेपर तो कहीं शान्ति नहीं रहती। शुभानने! तुम यह जान लो कि सम्पूर्ण प्रजाकी शान्ति सन्धिमूलक ही है ।। २९ ।।
ताः क्षिपेरन् प्रजाः सर्वाः क्षिप्रं द्रौपदि तादृशे । तस्मान्मन्युर्विनाशाय प्रजानामभवाय च ।। ३० ।। द्रौपदी! यदि राजा तुम्हारे कथनानुसार क्रोधी हो जाय तो सारी प्रजाओंका शीघ्र ही नाश हो जायगा। अतः यह समझ लो कि क्रोध प्रजावर्गके नाश और अवनतिका कारण है ।। ३० ।।
यस्मात् तु लोके दृश्यन्ते क्षमिणः पृथिवीसमाः । तस्माज्जन्म च भूतानां भवश्च प्रतिपद्यते ।। ३१ ।। इस जगत्में पृथ्वीके समान क्षमाशील पुरुष भी देखे जाते हैं, इसीलिये प्राणियोंकी उत्पत्ति और वृद्धि होती रहती है ।। ३१ ।।
क्षन्तव्यं पुरुषेणेह सर्वापत्सु सुशोभने । क्षमावतो हि भूतानां जन्म चैव प्रकीर्तितम् ।। ३२ ।। सुशोभने! पुरुषको सभी आपत्तियोंमें क्षमाभाव रखना चाहिये। क्षमाशील पुरुषसे ही समस्त प्राणियोंका जीवन बताया गया है ।। ३२ ।।
आक्रुष्टस्ताडितः क्रुद्धः क्षमते यो बलीयसा । यश्च नित्यं जितक्रोधो विद्वानुत्तमपूरुषः ।। ३३ ।। जो बलवान् पुरुषके गाली देने या कुपित होकर मारनेपर भी क्षमा कर जाता है तथा जो सदा अपने क्रोधको काबूमें रखता है, वही विद्वान् है और वही श्रेष्ठ पुरुष है ।। ३३ ।।
प्रभाववानपि नरस्तस्य लोकाः सनातनाः । क्रोधनस्त्वल्पविज्ञानः प्रेत्य चेह च नश्यति ।। ३४ ।। वही मनुष्य प्रभावशाली कहा जाता है। उसीको सनातन लोक प्राप्त होते हैं। क्रोधी मनुष्य अल्पज्ञ होता है। वह इस लोक और परलोक दोनोंमें विनाशका ही भागी होता है ।। ३४ ।।
अत्राप्युदाहरन्तीमा गाथा नित्यं क्षमावताम् । गीताः क्षमावता कृष्णे काश्यपेन महात्मना ।। ३५ ।। इस विषयमें जानकार लोग क्षमावान् पुरुषोंकी गाथाका उदाहरण देते हैं। कृष्णे! क्षमावान् महात्मा काश्यपने इस गाथाका गान किया है ।। ३५ ।।