महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतां तथा शोकसंतप्तां दृष्ट्वा प्ररुदितां स्त्रियः । कीचकस्य वधं सर्वा मनोभिश्च शशंसिरे ॥ उसका मुँह रक्तसे भींगा हुआ था, आँखोंमें रुलाईके आँसू भरे हुए थे। उसे इस प्रकार शोकसे संतप्त होकर रोती देख सब स्त्रियाँ मन-ही-मन कीचकके वधकी इच्छा करने लगीं।
जनमेजय उवाच
अहो दुःखतरं प्राप्ता कीचकेन पदा हता । पतिव्रता महाभागा द्रौपदी योषितां वरा ॥ जनमेजय बोले—विप्रवर! संसारकी युवतियोंमें श्रेष्ठ एवं पतिव्रता महाभागा द्रौपदीको कीचकने लात मार दी; इससे वह महान् दुःखमें डूब गयी। अहो! यह कितने कष्टकी बात है।
दुःशलां मानयन्ती या भर्तॄणां भगिनीं शुभाम् । नाशपत् सिन्धुराजं तं बलात्कारेण वाहिता ॥ जिस समय सिन्धुराज जयद्रथने बलपूर्वक उसका अपहरण किया था, उस समय उसने अपने पतियोंकी बहिन दुःशलाका सम्मान करते हुए वह कष्ट सह लिया और शुभलक्षणा सिन्धुराजको शाप नहीं दिया।
किमर्थं धर्षणं प्राप्ता कीचकेन दुरात्मना । नाशपत् तं महाभागा कृष्णा पादेन ताडिता ॥ परंतु जब दुरात्मा कीचकने उसका तिरस्कार किया और उसे लातसे मारा, उस समय महाभागा कृष्णाने उस दुष्टको शाप क्यों नहीं दे दिया?।
तेजोराशिरियं देवी धर्मज्ञा सत्यवादिनी । केशपक्षे परामृष्टा मर्षयिष्यत्यशक्तवत् ॥ नैतत् कारणमल्पं हि श्रोतुकामोऽस्मि सत्तम । कृष्णायास्तु परिक्लेशान्मनो मे दूयते भृशम् ॥ देवी द्रौपदी तेजकी राशि थी। वह धर्मज्ञा और सत्यवादिनी थी। उसके-जैसी तेजस्विनी स्त्री अपने केश पकड़ लिये जानेपर असमर्थकी भाँति चुपचाप सह लेगी, यह सम्भव नहीं है। यदि उसने सह लिया तो इसका कोई छोटा कारण नहीं होगा। साधुशिरोमणे! मैं वह कारण सुनना चाहता हूँ। कृष्णाके क्लेशकी बात सुनकर मेरा मन अत्यन्त व्यथित हो रहा है।
कस्य वंशे समुद्भूतः स च दुर्ललितो मुने । बलोन्मत्तः कथं चासीच्छ्यालो मात्स्यस्य कीचकः ॥ मुने! मत्स्यराजका साला दुष्ट कीचक किसके कुलमें उत्पन्न हुआ था? और वह बलसे उन्मत्त क्यों हो गया था? ।