भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 2246, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 2246

क्षमावतामयं लोकः परश्चैव क्षमावताम् । एतत् सर्वं विजानन्ती सा क्षमामन्वपद्यत ॥ क्षमा धर्म है, क्षमा दान है, क्षमा यज्ञ है, क्षमा यश है, क्षमा सत्य है, क्षमा शील है, क्षमा कीर्ति है, क्षमा सबसे उत्कृष्ट तत्त्व है, क्षमा पुण्य है, क्षमा तीर्थ है और क्षमा सब कुछ है; ऐसा श्रुतिका कथन है। यह लोक क्षमावानोंका ही है। परलोक भी क्षमावानोंका ही है। द्रौपदी यह सब कुछ जानती थी, इसलिये उसने क्षमाका ही आश्रय लिया। भर्तॄणां मतमाज्ञाय क्षमिणां धर्मचारिणाम् । नाशपत् तं विशालाक्षी सती शक्तापि भारत ॥ भरतनन्दन! क्षमाशील एवं धर्मात्मा पतियोंका मत जानकर विशाल नेत्रोंवाली सती-साध्वी द्रौपदीने समर्थ होते हुए भी कीचकको शाप नहीं दिया। पाण्डवाश्चापि ते सर्वे द्रौपदीं प्रेक्ष्य दुःखिताः । क्रोधाग्निना व्यदह्यन्त तदा कालव्यपेक्षया ॥ समस्त पाण्डव भी द्रौपदीकी दुरवस्था देखकर दुःखी हो समयकी प्रतीक्षा करते हुए क्रोधाग्निमें जलते रहे। अथ भीमो महाबाहुः सूदयिष्यंस्तु कीचकम् । वारितो धर्मपुत्रेण वेलयेव महोदधिः ॥ महाबाहु भीमसेन तो कीचकको तत्काल मार डालनेके लिये उद्यत थे; परंतु जैसे वेला (तटकी सीमा) महासागरके वेगको रोके रहती है, उसी प्रकार धर्मपुत्र युधिष्ठिरने उन्हें रोक दिया। संधार्य मनसा रोषं दिवारात्रं विनिःश्वसन् । महानसे तदा कृच्छ्रात् सुषवाप रजनीं च ताम् ॥) वे मनमें क्रोधको रोककर दिन-रात लंबी साँसें खींचते रहते थे। उस दिन पाकशालामें जाकर वे रातमें बड़े कष्टसे सोये।

इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि कीचकवधपर्वणि द्रौपदीपरिभवे षोडशोऽध्यायः ॥ १६ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत कीचकवधपर्वमें द्रौपदीतिरस्कारसम्बन्धी सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ९२ श्लोक मिलाकर कुल १४३ श्लोक हैं।)

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