महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउत्तिष्ठोत्तिष्ठ किं शेषे भीमसेन यथा मृतः । नामृतस्य हि पापीयान् भार्यामालभ्य जीवति ॥ १५ ॥
‘भीमसेन! उठो, उठो, क्यों मुर्देकी तरह सो रहे हो?; क्योंकि (तुम्हारे-जैसे वीर) पुरुषके जीवित रहते हुए उसकी पत्नीका स्पर्श करके कोई महापापी मनुष्य जीवित नहीं रह सकता’ ॥ १५ ॥
स सम्प्रहाय शयनं राजपुत्र्या प्रबोधितः । उपातिष्ठत मेघाभः पर्यङ्के सोपसंग्रहे ॥ १६ ॥ अथाब्रवीद् राजपुत्रीं कौरव्यो महिषीं प्रियाम् । केनास्यर्थेन सम्प्राप्ता त्वरितेव ममान्तिकम् ॥ १७ ॥ न ते प्रकृतिमान् वर्णः कृशा पाण्डुश्च लक्ष्यसे । आचक्ष्व परिशेषेण सर्वं विद्यामहं यथा ॥ १८ ॥
राजकुमारी द्रौपदीके जगानेपर मेघके समान श्याम वर्णवाले कुरुनन्दन भीमसेन तोशक बिछे हुए पलंगपर शयन छोड़कर उठ बैठे और अपनी प्यारी रानीसे बोले—‘देवि! किस कार्यसे तुम इतनी उतावली-सी होकर मेरे पास आयी हो? तुम्हारे शरीरकी कान्ति स्वाभाविक नहीं रह गयी है। तुमपर उदासी छायी है। तुम दुबली और पीली दिखायी देती हो। पूरी बात बताओ, जिससे मैं सब कुछ जान सकूँ’ ॥ १६—१८ ॥