भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2254

भ्रातरं च विगर्हस्व ज्येष्ठं दुर्धूतदेविनम् । यस्यास्मि कर्मणा प्राप्ता दुःखमेतदनन्तकम् ॥ १० ॥ दूषित द्यूतक्रीड़ामें लगे रहनेवाले अपने उस बड़े भाईकी निन्दा करो, जिसकी करतूतसे मैं इस अनन्त दुःखमें पड़ गयी हूँ ॥ १० ॥

को हि राज्यं परित्यज्य सर्वस्वं चात्मना सह । प्रव्रज्यायैव दीव्येत विना दुर्धूतदेविनम् ॥ ११ ॥ निन्दनीय जूएमें आसक्त रहनेवाले उस जुआरीको छोड़कर दूसरा कौन ऐसा पुरुष होगा, जो अपने साथ ही राज्य तथा सर्वस्वका परित्याग करके वनवास लेनेकी शर्तपर जूआ खेल सकता हो? ॥ ११ ॥

यदि निष्कसहस्रेण यच्चान्यत् सारवद् धनम् । सायम्प्रातरदेविष्यदपि संवत्सरान् बहून् ॥ १२ ॥ रुक्मं हिरण्यं वासांसि यानं युग्ममजाविकम् । अश्वाश्वतरसङ्घांश्च न जातु क्षयमावहेत् ॥ १३ ॥ यदि वे प्रतिदिन शाम-सबेरे एक सहस्र स्वर्ण-मुद्राओंसे जूआ खेलते तथा जो दूसरे बहुमूल्य धन थे, उनको—सोने, चाँदी, वस्त्र, सवारी, रथ, बकरी, भेड़, घोड़े और खच्चरों आदिके समूहको बहुत वर्षोंतक भी दाँवपर लगाते रहते, तो भी हमारा राज्य-वैभव कभी क्षीण नहीं होता ॥ १२-१३ ॥

सोऽयं द्यूतप्रवादेन श्रियः प्रत्यवरोपितः । तूष्णीमास्ते यथा मूढः स्वानि कर्माणि चिन्तयन् ॥ १४ ॥ जूएकी आसक्तिने इन्हें राजलक्ष्मीके सिंहासनसे नीचे उतार दिया है और अब ये अपने उन कर्मोंका चिन्तन करते हुए अज्ञकी भाँति चुपचाप बैठे रहते हैं ॥

दश नागसहस्राणि हयानां हेममालिनाम् । यं यान्तमनुयान्तीह सोऽयं द्यूतेन जीवति ॥ १५ ॥ जिनके कहीं यात्रा करते समय दस हजार हाथी और सोनेकी मालाएँ पहने हुए सहस्रों घोड़े पीछे-पीछे चलते थे, वे ही महाराज यहाँ जूएसे जीविका चलाते हैं ॥

रथाः शतसहस्राणि नृपाणाममितौजसाम् । उपासन्त महाराजमिन्द्रप्रस्थे युधिष्ठिरम् ॥ १६ ॥ शतं दासीसहस्राणां यस्य नित्यं महानसे । पात्रीहस्तं दिवारात्रमतिथीन् भोजयन्त्युत ॥ १७ ॥ एष निष्कसहस्राणि प्रदाय ददतां वरः । द्यूतजेन ह्यनर्थेन महता समुपाश्रितः ॥ १८ ॥ इन्द्रप्रस्थमें जिनकी सवारीके लिये एक लाख रथ प्रस्तुत रहते थे और जिन महाराज युधिष्ठिरकी सेवामें सहस्रों महापराक्रमी राजा बैठा करते थे, जिनके भोजनालयमें नित्य एक