भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 2259

जब रानी सुदेष्णा दर्शक बनकर बैठती हैं और तुम महलके आँगनमें व्याघ्रों, सिंहों तथा भैंसोंसे लड़ते हो, उस समय मुझे बड़ी व्यथा होती है ॥ ६ ॥ तत उत्थाय कैकेयी सर्वास्ताः प्रत्यभाषत । प्रेष्याः समुत्थिताश्चापि कैकेयीं ताः स्त्रियोऽब्रुवन् ॥ ७ ॥ प्रेक्ष्य मामनवद्याङ्गीं कश्मलोपहतामिव । एक दिन उक्त पशुओंसे तुम्हारा युद्ध देखकर उठनेके बाद मुझ निर्दोष अंगोंवाली अबलाको इसी कारण शोकपीड़ित-सी देख केकयराजकुमारी सुदेष्णा अपने साथ आयी हुई सम्पूर्ण दासियोंसे और वे खड़ी हुई दासियाँ रानी कैकेयीसे इस प्रकार कहने लगीं— ॥ स्नेहात् संवासजाद् धर्मात् सूदमेषा शुचिस्मिता ॥ ८ ॥ योद्धयमानं महावीर्यमियं समनुशोचति । कल्याणरूपा सैरन्ध्री बल्लवश्चापि सुन्दरः ॥ ९ ॥ ‘यह पवित्र मुसकानवाली सैरन्ध्री पहले (युधिष्ठिरके यहाँ) एक स्थानमें साथ-साथ रहनेके कारण पैदा होनेवाले स्नेहसे अथवा धर्मसे प्रेरित होकर उस महापराक्रमी रसोइयेको पशुओंसे लड़ते देख उसके लिये बार-बार शोक करने लगती है। सैरन्ध्रीका रूप तो मंगलमय है ही, बल्लव भी बड़ा सुन्दर है ॥ ८-९ ॥ स्त्रीणां चित्तं च दुर्ज्ञेयं युक्तरूपौ च मे मतौ । सैरन्ध्री प्रियसंवासान्नित्यं करुणवादिनी ॥ १० ॥ ‘स्त्रियोंके हृदयको समझ लेना बहुत कठिन है, हमें तो यह जोड़ी अच्छी जान पड़ती है। सैरन्ध्री अपने प्रिय सम्बन्धके कारण जब रसोइयेको हाथी आदिसे लड़ानेकी बात की जाती है, तब (अत्यन्त दीन-सी होकर) सदा करुणायुक्त वचन बोलने लगती है ॥ १० ॥ अस्मिन् राजकुले चेमौ तुल्यकालनिवासिनौ । इति ब्रुवाणा वाक्यानि सा मां नित्यमतर्जयत् ॥ ११ ॥ ‘क्यों न हो, इस राजपरिवारमें भी तो ये दोनों एक ही समयसे निवास करते हैं?’ इस तरहकी बातें कहकर रानी सुदेष्णा प्रायः नित्य मुझे झिड़का करती हैं ॥ क्रुध्यन्तीं मां च सम्प्रेक्ष्य समशङ्कत मां त्वयि । तस्यां तथा ब्रुवत्यां तु दुःखं मां महदाविशत् ॥ १२ ॥ और मुझे क्रोध करती देख तुम्हारे प्रति मेरे गुप्त प्रेमकी आशंका कर बैठती हैं। जब-जब वे वैसी बातें कहती हैं, उस समय मुझे बहुत दुःख होता है ॥ १२ ॥ त्वय्येवं निरयं प्राप्ते भीमे भीमपराक्रमे । शोके यौधिष्ठिरे मग्ना नाहं जीवितुमुत्सहे ॥ १३ ॥ भीम! भयंकर पराक्रम दिखानेवाले होकर भी तुम ऐसे नरकतुल्य कष्ट भोग रहे हो और उधर महाराज युधिष्ठिरको भी भारी शोक सहन करना पड़ता है। इस प्रकार मैं दुःखके समुद्रमें डूबी हुई हूँ। अब मुझे जीवित रहनेका तनिक भी उत्साह नहीं है ॥ १३ ॥