महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशरीर पीला पड़ जाता है ।। ३२ ।। सहदेवस्य वृत्तानि चिन्तयन्ती पुनः पुनः । न निद्रामभिगच्छामि भीमसेन कुतो रतिम् ।। ३३ ।। भीमसेन! सहदेवकी दुर्दशाका बार-बार चिन्तन करनेके कारण मुझे कभी नींदतक नहीं आती; फिर सुख कहाँसे मिल सकता है? ।। ३३ ।। न विन्दामि महाबाहो सहदेवस्य दुष्कृतम् । यस्मिन्नेवंविधं दुःखं प्राप्नुयात् सत्यविक्रमः ।। ३४ ।। महाबाहो! जहाँतक मैं जानती हूँ, सहदेवने कभी कोई पाप नहीं किया है, जिससे इस सत्यपराक्रमी वीरको ऐसा दुःख उठाना पड़े ।। ३४ ।। दूयामि भरतश्रेष्ठ दृष्ट्वा ते भ्रातरं प्रियम् । गोषु गोवृषसंकाशं मत्स्येनाभिनिवेशितम् ।। ३५ ।। भरतश्रेष्ठ! साँड़के समान हृष्ट-पुष्ट तुम्हारे प्रिय भ्राता सहदेवको राजा विराटके द्वारा गौओंकी सेवामें लगाया गया देख मुझे बड़ा दुःख होता है ।। ३५ ।। संरब्धं रक्तनेपथ्यं गोपालानां पुरोगमम् । विराटमभिनन्दन्तमथ मे भवति ज्वरः ।। ३६ ।। गेरू आदिसे लाल रंगका शृंगार धारण किये ग्वालोंके अगुआ बने हुए सहदेवको उद्विग्न होनेपर भी जब मैं राजा विराटका अभिनन्दन करते देखती हूँ, तब मुझे बुखार चढ़ आता है ।। ३६ ।। सहदेवं हि मे वीर नित्यमार्या प्रशंसति । महाभिजनसम्पन्नः शीलवान् वृत्तवानिति ।। ३७ ।। वीर! आर्या कुन्ती मुझसे सहदेवकी सदा प्रशंसा किया करती थीं कि यह महान् कुलमें उत्पन्न, शीलवान् और सदाचारी है ।। ३७ ।। ह्रीनिषेवो मधुरवाग्धार्मिकश्च प्रियश्च मे । स तेऽरण्येषु वोढव्यो याज्ञसेनि क्षपास्वपि ।। ३८ ।। सुकुमारश्च शूरश्च राजानं चाप्यनुव्रतः । ज्येष्ठापचायिनं वीरं स्वयं पाञ्चालि भोजयेः ।। ३९ ।। इत्युवाच हि मां कुन्ती रुदती पुत्रगृद्धिनी । प्रव्रजन्तं महारण्यं तं परिष्वज्य तिष्ठती ।। ४० ।। मुझे स्मरण है, जब सहदेव महान् वनमें आने लगे, उस समय पुत्रवत्सला माता कुन्ती उन्हें हृदयसे लगाकर खड़ी हो गयीं और रोती हुई मुझसे यों कहने लगीं—'याज्ञसेनी! सहदेव बड़ा लज्जाशील, मधुरभाषी और धार्मिक है। यह मुझे अत्यन्त प्रिय है। इसे वनमें रात्रिके समय तुम स्वयं सँभालकर (हाथ पकड़कर) ले जाना, क्योंकि यह सुकुमार है (सम्भव है, थकावटके कारण चल न सके)। मेरा सहदेव शूरवीर, राजा युधिष्ठिरका भक्त,