भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 2268

भरतश्रेष्ठ! जान पड़ता है, बचपनमें मैंने विधाताका निश्चय ही महान् अपराध किया है, जिसके फलस्वरूप मैं आज इस दुर्दशामें पड़ गयी हूँ ॥ १४ ॥ वर्णविकासमपि मे पश्य पाण्डव यादृशम् । तादृशो मे न तत्रासीद् दुःखे परमके तदा ॥ १५ ॥ पाण्डुनन्दन! देखो, मेरे शरीरकी कान्ति कैसी फीकी पड़ गयी है! यहाँ नगरमें मेरी जो अवस्था है, वह उन दिनों अत्यन्त दुःखपूर्ण वनवासके समय भी नहीं थी ॥ १६ ॥ त्वमेव भीम जानीषे यन्मे पार्थ सुखं पुरा । साहं दासीत्वमापन्ना न शान्तिमवशा लभे ॥ १६ ॥ नादैविकमहं मन्ये यत्र पार्थो धनंजयः । भीमधन्वा महाबाहुरास्ते छन्न इवानलः ॥ १७ ॥ भीमसेन! तुम्हीं जानते हो, पहले मुझे कितना सुख था। यहाँ आकर जबसे मैं दासीभावको प्राप्त हुई हूँ, तभीसे परतन्त्र होनेके कारण मुझे तनिक भी शान्ति नहीं मिलती है। इसे मैं दैवकी ही लीला मानती हूँ। जहाँ प्रचण्ड धनुष धारण करनेवाले महाबाहु अर्जुन भी राखसे ढकी हुई अग्निकी भाँति रनिवासमें छिपकर रहते हैं ॥ १६-१७ ॥ अशक्या वेदितुं पार्थ प्राणिनां वै गतिर्नरैः । विनिपातमिमं मन्ये युष्माकं ह्यविचिन्तितम् ॥ १८ ॥ कुन्तीनन्दन! दैवाधीन प्राणियोंकी कब क्या गति होगी, इसे जानना मनुष्योंके लिये सर्वथा असम्भव है। मैं तो समझती हूँ, तुमलोगोंकी जो यह अवनति हुई है, इसकी किसीके मनमें कल्पनातक नहीं थी ॥ १८ ॥ यस्या मम मुखप्रेक्षा यूयमिन्द्रसमाः सदा । सा प्रेक्षे मुखमन्यासामवराणां वरा सती ॥ १९ ॥ एक दिन वह था कि इन्द्रके समान पराक्रमी तुम सब भाई सदा मेरा मुँह निहारा करते थे। आज वही मैं श्रेष्ठ होकर भी अपनेसे निकृष्ट दूसरी स्त्रियोंका मुँह जोहती रहती हूँ ॥ १९ ॥ पश्य पाण्डव मेऽवस्थां यथा नार्हामि वै तथा । युष्मासु ध्रियमाणेषु पश्य कालस्य पर्ययम् ॥ २० ॥ यस्याः सागरपर्यन्ता पृथिवी वशवर्तिनी । आसीत् साद्य सुदेष्णाया भीताहं वशवर्तिनी ॥ २१ ॥ पाण्डुनन्दन! देखो, तुम सबके जीते-जी मैं ऐसी बुरी हालतमें पड़ी हूँ, जो मेरे लिये कदापि उचित नहीं है। समयके इस उलट-फेरको तो देखो; एक दिन समुद्रके पासतककी सारी पृथिवी जिसके अधीन थी, वही मैं आज सुदेष्णाके वशमें होकर उससे डरती रहती हूँ ॥ २०-२१ ॥ यस्याः पुरःसरा आसन् पृष्ठतश्चानुगामिनः ।