भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 2270, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 2270

नाल्पं कृतं मया भीम देवानां किल्बिषं पुरा ।
अभाग्या यत्र जीवामि कर्तव्ये सति पाण्डव ॥ २९ ॥
'पाण्डुनन्दन भीमसेन! मैंने पूर्वकालमें देवताओंका थोड़ा अपराध नहीं किया है, तभी तो मुझ अभागिनीको जहाँ मर जाना चाहिये, उस दशामें भी मैं जी रही हूँ' ॥

वैशम्पायन उवाच

ततस्तस्याः करौ सूक्ष्मौ किणबद्धौ वृकोदरः ।
मुखमानीय वै पत्न्या रुरोद परवीरहा ॥ ३० ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! तदनन्तर शत्रुहन्ता भीमसेन अपनी पत्नी द्रौपदीके दुबले-पतले हाथोंको, जिनमें घट्टे पड़ गये थे, अपने मुखपर लगाकर रो पड़े ॥ ३० ॥

तौ गृहीत्वा च कौन्तेयो बाष्पमुत्सृज्य वीर्यवान् ।
ततः परमदुःखार्त इदं वचनमब्रवीत् ॥ ३१ ॥
फिर पराक्रमी भीमने उन हाथोंको पकड़कर आँसू बहाते हुए अत्यन्त दुःखसे पीड़ित हो इस प्रकार कहा ॥ ३१ ॥

इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि कीचकवधपर्वणि द्रौपदीभीमसंवादे विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत कीचकवधपर्वमें द्रौपदी-भीम-संवादविषयक बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २० ॥

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