महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2274, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहाबली भीमसेन! अब बीती बातोंको दुहरानेसे क्या लाभ? इस समय जिसका अवसर उपस्थित है, उस कार्यके लिये तैयार हो जाओ ।। १९ ।। ममेह भीम कैकेयी रूपाभिभवशङ्कया । नित्यमुद्विजते राजा कथं नेयादिमामिति ।। २० ।। भीम! केकयकुमारी सुदेष्णा यहाँ मेरे रूपसे पराजित होनेके कारण सदा इस शंकासे उद्विग्न रहती है कि राजा विराट किसी प्रकार इसपर आसक्त न हो जायँ ।। २० ।। तस्या विदित्वा तं भावं स्वयं चानृतदर्शनः । कीचकोऽयं सुदुष्टात्मा सदा प्रार्थयते हि माम् ।। २१ ।। जिसका देखना भी अनृत (पापमय) है, वही यह परम दुष्टात्मा कीचक रानी सुदेष्णाके उक्त मनोभाव-को जानकर सदा स्वयं आकर मेरे आगे प्रार्थना किया करता है ।। २१ ।। तमहं कुपिता भीम पुनः कोपं नियम्य च । अब्रुवं कामसम्मूढमात्मानं रक्ष कीचक ।। २२ ।। भीम! पहले-पहल उसके ऐसा कहनेपर मैं कुपित हो उठी; किंतु पुनः क्रोधके वेगको रोककर बोली—'कीचक! तू कामसे मोहित हो रहा है। अरे! तू अपने-आपकी रक्षा कर ।। २२ ।। गन्धर्वाणामहं भार्या पञ्चानां महिषी प्रिया । ते त्वां निहन्युः कुपिताः शूराः साहसकारिणः ।। २३ ।। 'मैं पाँच गन्धर्वोंकी पत्नी तथा प्यारी रानी हूँ। वे साहसी तथा शूरवीर गन्धर्व तुम्हें कुपित होकर मार डालेंगे' ।। २३ ।। एवमुक्तः सुदुष्टात्मा कीचकः प्रत्युवाच ह । नाहं बिभेमि सैरन्ध्रि गन्धर्वाणां शुचिस्मिते ।। २४ ।। मेरे ऐसा कहनेपर महा दुष्टात्मा कीचकने उत्तर दिया—'पवित्र मुसकानवाली सैरन्ध्री! मैं गन्धर्वोंसे नहीं डरता ।। २४ ।। शतं शतसहस्राणि गन्धर्वाणामहं रणे । समागतं हनिष्यामि त्वं भीरु कुरु मे क्षणम् ।। २५ ।। 'भीरु! यदि युद्धमें मेरे सामने एक करोड़ गन्धर्व भी आ जायँ, तो मैं उन्हें मार डालूँगा; परंतु तुम मुझे स्वीकार कर लो' ।। २५ ।। इत्युक्ते चाब्रुवं मत्तं कामातुरमहं पुनः । न त्वं प्रतिबलश्चैषां गन्धर्वाणां यशस्विनाम् ।। २६ ।। उसके इस प्रकार उत्तर देनेपर मैंने पुनः उस कामातुर और मतवाले कीचकसे कहा—'कीचक! तू मेरे यशस्वी पति गन्धर्वोंके समान बलवान् नहीं है ।। २६ ।। धर्मे स्थितास्मि सततं कुलशीलसमन्विता । नेच्छामि कंचिद् वध्यन्तं तेन जीवसि कीचक ।। २७ ।।