भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2280

तस्यां रात्र्यां व्यतीतायां प्रातरुत्थाय कीचकः । गत्वा राजकुलायैव द्रौपदीमिदमब्रवीत् ॥ ७ ॥ वह रात बीत जानेपर कीचक सबेरे उठा और राजमहलमें जाकर द्रौपदीसे इस प्रकार बोला— ॥ ७ ॥

सभायां पश्यतो राज्ञः पातयित्वा पदाहनम् । न चैवालभसे त्राणमभिपन्ना बलीयसा ॥ ८ ॥ ‘सैरन्ध्री! मैंने राजसभामें तुम्हारे महाराजके देखते-देखते तुम्हें पृथ्वीपर गिराकर लातोंसे मारा था। तुम मुझ-जैसे महाबलवान् पुरुषके पाले पड़ी हो; तुम्हें कोई बचा नहीं सकता ॥ ८ ॥

प्रवादेनेह मत्स्यानां राजा नाम्नायमुच्यते । अहमेव हि मत्स्यानां राजा वै वाहिनीपतिः ॥ ९ ॥ ‘राजा विराट तो कहनेके लिये ही मत्स्यदेशका नाममात्रका राजा है। वास्तवमें मैं ही यहाँका राजा हूँ; क्योंकि सेनाका मालिक मैं हूँ ॥ ९ ॥

मां सुखं प्रतिपद्यस्व दासो भीरु भवामि ते । अह्नाय तव सुश्रोणि शतं निष्कान् ददाम्यहम् ॥ १० ॥ ‘भीरु! सुखपूर्वक मुझे स्वीकार कर लो, फिर तो मैं तुम्हारा दास बन जाऊँगा। सुश्रोणि! मैं तुम्हारे दैनिक खर्चके लिये प्रतिदिन सौ मोहरें देता रहूँगा ॥ १० ॥

दासीशतं च ते दद्यां दासानामपि चापरम् । रथं चाश्वतरीयुक्तमस्तु नौ भीरु संगमः ॥ ११ ॥ ‘तुम्हारी सेवाके लिये सौ दासियाँ और उतने ही दास दूँगा। तुम्हारी सवारीके लिये खच्चरियोंसे जुता हुआ रथ प्रस्तुत रहेगा। भीरु! अब हम दोनोंका परस्पर समागम होना चाहिये ॥ ११ ॥

द्रौपद्युवाच

एवं मे समयं त्वद्य प्रतिपद्यस्व कीचक । न त्वां सखा वा भ्राता वा जानीयात् संगतं मया ॥ १२ ॥ द्रौपदीने कहा—कीचक! यदि ऐसी बात है, तो आज मेरी एक शर्त स्वीकार करो। तुम मुझसे मिलने आते हो—यह बात तुम्हारा मित्र अथवा भाई कोई भी न जाने ॥ १२ ॥

अनुप्रवादाद् भीतास्मि गन्धर्वाणां यशस्विनाम् । एवं मे प्रतिजानीहि ततोऽहं वशगा तव ॥ १३ ॥ क्योंकि मैं यशस्वी गन्धर्वोंके अपवादसे डरती हूँ। यदि इस बातके लिये मुझसे प्रतिज्ञा करो, तो मैं तुम्हारे अधीन हो सकती हूँ ॥ १३ ॥

कीचक उवाच