महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2282, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ें**वैशम्पायनजी कहते हैं—**राजन्! इस प्रकार कीचकके साथ बात करनेके बाद द्रौपदीको अवशिष्ट आधा दिन (भीमसेनसे यह बात निवेदन करनेकी प्रतीक्षामें) एक महीनेके समान भारी मालूम हुआ ।। १८ ।। कीचकोऽथ गृहं गत्वा भृशं हर्षपरिप्लुतः । सैरन्ध्रीरूपिणं मूढो मृत्युं तं नावबुद्धवान् ।। १९ ।। इधर कीचक महान् हर्षमें भरा हुआ अपने घरको गया। उस मूर्खको यह पता नहीं था कि सैरन्ध्रीके रूपमें मेरी मृत्यु आ रही है ।। १९ ।। गन्धाभरणमाल्येषु व्यासक्तः सविशेषतः । अलंचक्रे तदाऽऽत्मानं सत्वरः काममोहितः ।। २० ।। वह तो कामसे मोहित हो रहा था, अतः घर जाकर शीघ्र ही अपने-आपको (गहने-कपड़ोंसे) सजाने लगा। वह विशेषतः सुगन्धित पदार्थों, आभूषणों तथा मालाओंके सेवनमें संलग्न रहा ।। २० ।। तस्य तत् कुर्वतः कर्म कालो दीर्घ इवाभवत् । अनुचिन्तयतश्चापि तामेवायतलोचनाम् ।। २१ ।। मन-ही-मन विशाल नेत्रोंवाली द्रौपदीका बारंबार चिन्तन करते हुए शृंगार धारण करते समय कीचकको वह थोड़ा-सा समय भी उत्कण्ठावश बहुत बड़ा-सा प्रतीत हुआ ।। २१ ।। आसीदभ्यधिका चापि श्रीः श्रियं प्रमुमुक्षतः । निर्वाणकाले दीपस्य वर्तीमिव दिधक्षतः ।। २२ ।। वास्तवमें जो सदाके लिये राजलक्ष्मीसे वियुक्त होनेवाला है, उस कीचककी भी उस समय शृंगार आदि धारण करनेसे श्री (शोभा) बहुत बढ़ गयी थी। ठीक उसी तरह जैसे बुझनेके समय बत्तीको भी जला देनेकी इच्छावाले दीपककी प्रभा विशेष बढ़ जाती है ।। २२ ।। कृतसम्प्रत्ययस्तस्याः कीचकः काममोहितः । नाजानाद् दिवसं यान्तं चिन्तयानः समागमम् ।। २३ ।। काममोहित कीचकने द्रौपदीकी बातपर पूरा विश्वास कर लिया था; अतः उसके समागम-सुखका चिन्तन करते-करते उसे यह भी पता न चला कि दिन कब बीत गया ।। २३ ।। ततस्तु द्रौपदी गत्वा तदा भीमं महानसे । उपातिष्ठत कल्याणी कौरव्यं पतिमन्तिकम् ।। २४ ।। तदनन्तर कल्याणस्वरूपा द्रौपदी पाकशालामें अपने पति कुरुनन्दन भीमसेनके पास गयी ।। २४ ।। तमुवाच सुकेशान्ता कीचकस्य मया कृतः । संगमो नर्तनागारे यथावोचः परंतप ।। २५ ।।