महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2284, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंमैं सत्य, धर्म और भाइयोंको आगे करके—उनकी शपथ खाकर तुमसे कहता हूँ, जैसे देवराज इन्द्रने वृत्रासुरको मारा था, उसी प्रकार मैं भी कीचकका वध कर डालूँगा ॥ ३२ ॥ तं गह्वरे प्रकाशे वा पोथयिष्यामि कीचकम् । अथ चेदपि योत्स्यन्ति हिंसे मत्स्यान्पि ध्रुवम् ॥ ३३ ॥ एकान्तमें या जन-समुदायमें जहाँ भी वह मिलेगा, कीचकको मैं कुचल डालूँगा और यदि मत्स्यदेशके लोग उसकी ओरसे युद्ध करेंगे, तो उन्हें भी निश्चय ही मार डालूँगा ॥ ३३ ॥ ततो दुर्योधनं हत्वा प्रतिपत्स्ये वसुन्धराम् । कामं मत्स्यमुपास्तां हि कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ ३४ ॥ तदनन्तर दुर्योधनको मारकर समूची पृथ्वीका राज्य ले लूँगा। भले ही कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर यहाँ बैठकर मत्स्यराज विराटकी उपासना करते रहें ॥ ३४ ॥
द्रौपद्युवाच यथा न संत्यजेथास्त्वं सत्यं वै मत्कृते विभो । निगूढस्त्वं तथा पार्थ कीचकं तं निष्षूदय ॥ ३५ ॥ द्रौपदीने कहा—प्रभो! तुम वही करो, जिससे मेरे लिये तुम्हें सत्यका परित्याग न करना पड़े। कुन्तीनन्दन! तुम अपनेको गुप्त रखकर ही उस कीचकका संहार करो ॥ ३५ ॥
भीमसेन उवाच एवमेतत् करिष्यामि यथा त्वं भीरु भाषसे । अद्य तं सूदयिष्यामि कीचकं सह बान्धवैः ॥ ३६ ॥ भीमसेन बोले—ठीक है, भीरु! तुम जैसा कहती हो, वही करूँगा। आज मैं उस कीचकको उसके भाई-बन्धुओंसहित मार डालूँगा ॥ ३६ ॥ अदृश्यमानस्तस्याथ तमस्विन्यामनिन्दिते । नागो बिल्वमिवाक्रम्य पोथयिष्याम्यहं शिरः । अलभ्यामिच्छतस्तस्य कीचकस्य दुरात्मनः ॥ ३७ ॥ अनिन्दिते! गजराज जैसे बेलके फलपर पैर रखकर उसे कुचल दे, उसी प्रकार मैं अँधेरी रातमें उससे अदृश्य रहकर तुझ-जैसी अलभ्य नारीको प्राप्त करनेकी इच्छावाले दुरात्मा कीचकके मस्तकको कुचल डालूँगा ॥ ३७ ॥
वैशम्पायन उवाच भीमोऽथ प्रथमं गत्वा रात्रौ छन्न उपाविशत् । मृगं हरिरिवादृश्यः प्रत्याकाङ्क्षत कीचकम् ॥ ३८ ॥