महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 232, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंकथमक्षव्यसनजा बुद्धिरापतिता तव ॥ १९ ॥ आप सरल, कोमल, उदार, लज्जाशील और सत्यवादी हैं। न जाने कैसे आपकी बुद्धिमें जूआ खेलनेका व्यसन आ गया ॥ १९ ॥
अतीव मोहमायाति मनश्च परिभूयते । निशाम्य ते दुःखमिदमिमां चापदमीदृशीम् ॥ २० ॥ आपके इस दुःख और भयंकर विपत्तिको विचारकर मुझे अत्यन्त मोह प्राप्त हो रहा है और मेरा मन दुःखसे पीड़ित हो रहा है ॥ २० ॥
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । ईश्वरस्य वशे लोकास्तिष्ठन्ते नात्मनो यथा ॥ २१ ॥ इस विषयमें लोग इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण देते हैं, जिसमें यह कहा गया है कि सब लोग ईश्वरके वशमें हैं, कोई भी स्वाधीन नहीं है ॥ २१ ॥
धातैव खलु भूतानां सुखदुःखे प्रियाप्रिये । दधाति सर्वमीशानः पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरन् ॥ २२ ॥ विधाता ईश्वर ही सबके पूर्वकर्मोंके अनुसार प्राणियोंके लिये सुख-दुःख, प्रिय-अप्रियकी व्यवस्था करते हैं ॥ २२ ॥
यथा दारुमयी योषा नरवीर समाहिता । ईरयत्यङ्गमङ्गानि तथा राजन्निमाः प्रजाः ॥ २३ ॥ नरवीर नरेश! जैसे कठपुतली सूत्रधारसे प्रेरित हो अपने अंगोंका संचालन करती है, उसी प्रकार यह सारी प्रजा ईश्वरकी प्रेरणासे अपने हस्त-पाद आदि अंगोंद्वारा विविध चेष्टाएँ करती हैं ॥ २३ ॥
आकाश इव भूतानि व्याप्य सर्वाणि भारत । ईश्वरो विदधातीह कल्याणं यच्च पापकम् ॥ २४ ॥ भारत! ईश्वर आकाशके समान सम्पूर्ण प्राणियोंमें व्याप्त होकर उनके कर्मानुसार सुख-दुःखका विधान करते हैं ॥ २४ ॥
शकुनिस्तन्तुबद्धो वा नियतोऽयमनीश्वरः । ईश्वरस्य वशे तिष्ठेन्नान्येषां नात्मनः प्रभुः ॥ २५ ॥ जीव स्वतन्त्र नहीं है, वह डोरेमें बँधे हुए पक्षीकी भाँति कर्मके बन्धनमें बँधा होनेसे परतन्त्र है। वह ईश्वरके ही वशमें होता है। उसका न दूसरोंपर वश चलता है, न अपने ऊपर ॥ २५ ॥
मणिः सूत्र इव प्रोतो नस्योत इव गोवृषः । स्रोतसो मध्यमापन्नः कूलाद् वृक्ष इव च्युतः ॥ २६ ॥ धातुरादेशमन्वेति तन्मयो हि तदर्पणः । नात्माधीनो मनुष्योऽयं कालं भजति कंचन ॥ २७ ॥