महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2327, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंगृहीते गोधने नूनं तेऽपि योत्स्यन्ति पाण्डवाः ।
अपूर्णे समये चापि यदि पश्येम पाण्डवान् ।
द्वादशान्यानि वर्षाणि प्रवेक्ष्यन्ति पुनर्वनम् ॥
हमलोग वहाँ चलकर मत्स्यराष्ट्रको तहस-नहस करेंगे और राजा विराटके गोधनपर अपना अधिकार कर लेंगे। उनके गोधनका अपहरण कर लेनेपर निश्चय ही पाण्डव भी हम लोगोंके साथ युद्ध करेंगे। ऐसी दशामें यदि अज्ञातवासका समय पूर्ण होनेसे पूर्व ही हम पाण्डवोंको देख लेंगे, तो उन्हें पुनः दूसरी बार बारह वर्षोंके लिये वनमें प्रवेश करना पड़ेगा।
तस्मादन्यतरेणापि लाभोऽस्माकं भविष्यति ।
कोषवृद्धिर्हिहास्माकं शत्रूणां निधनं भवेत् ॥
कथं सुयोधनं गच्छेद युधिष्ठिरभृतः पुरा ।
एतच्चापि वदत्येष मात्स्यः परिभवान्मयि ॥
अतः दोमेंसे एक भी हो जाय, तो भी हमें लाभ ही होगा। इस रणयात्रासे हमारे कोषकी वृद्धि होगी और शत्रुओंका नाश हो जायगा। मत्स्यदेशका राजा विराट मेरे प्रति तिरस्कारका भाव रखकर यह भी कहा करता है कि पूर्वकालमें धर्मराज युधिष्ठिरने जिसका पालन-पोषण किया हो, वह दुर्योधनके अधिकारमें कैसे जा सकता है?।
तस्मात् कर्तव्यमेतद् वै तत्र यात्रा विधीयताम् ।
एतत् सुनीतं मन्येऽहं सर्वेषां यदि रोचते ॥)
अतः निश्चय ही मत्स्यदेशपर आक्रमण करना चाहिये। वहाँकी यात्रा अवश्य की जाय। यदि आप सब लोगोंको अच्छा लगे, तो मैं इस कार्यको नीतिके अनुकूल मानता हूँ।
इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि गोहरणपर्वणि चारप्रत्याचारे कृपवाक्ये एकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥ २९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत गोहरणपर्वमें गुप्तचर भेजनेके विषयमें कृपाचार्यवचनसम्बन्धी उनतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २९ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २० श्लोक मिलाकर कुल ३४ श्लोक हैं।)
* जब शत्रुको शक्ति अपने बराबर हो, तब उसके प्रति साम और भेदनीतिका प्रयोग करना चाहिये अर्थात् उससे समझौता करना या उसकी सेनामें फूट डालनी चाहिये। यदि शत्रु अपनेसे अधिक शक्तिशाली हो, तो वहाँ दाननीतिका प्रयोग उचित है अर्थात् उसे धन, रत्न आदि भेंट देकर शान्त करना चाहिये। यदि अपनी ही शक्ति अधिक हो, तो उसे दण्ड देना या युद्धमें मार गिराना चाहिये। अतः अपने और विपक्षीके बलाबलका ज्ञान प्राप्त करना अत्यन्त आवश्यक है।