महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशत्रुसमूहको रौंद डालनेवाले वे नरश्रेष्ठ कुन्तीपुत्र घोड़े जुते हुए रथोंपर बैठकर बड़ी प्रसन्नताके साथ राजभवनसे बाहर निकले ॥ २८ ॥
तरस्विनश्छन्नरूपाः सर्वे युद्धविशारदाः । रथान् हेमपरिच्छन्नानास्थाय च महारथाः ॥ २९ ॥ विराटमन्वयुः पार्थाः सहिताः कुरुपुङ्गवाः । चत्वारो भ्रातरः शूराः पाण्डवाः सत्यविक्रमाः ॥ ३० ॥
वे बड़े वेगसे चले। उन्होंने अपने यथार्थ स्वरूपको अभीतक छिपा रखा था। वे सब-के-सब युद्धकी कलामें अत्यन्त निपुण थे। कुरुवंशशिरोमणि वे चारों महारथी कुन्तीकुमार सुवर्णमण्डित रथोंपर आरूढ़ हो एक ही साथ विराटके पीछे-पीछे चले। चारों भाई पाण्डव शूरवीर और सत्यपराक्रमी थे ॥ २९-३० ॥
(दीर्घाणां च दृढानां च धनुषां ते यथाबलम् । उत्कृष्य पाशान् मौर्वीणां वीराश्चापेष्वयोजयन् ॥ ततः सुवाससः सर्वे ते वीराश्चन्दनोक्षिताः । चोदिता नरदेवेन क्षिप्रमश्वानचोदयन् ॥ ते हया हेमसंच्छन्ना बृहन्तः साधुवाहिनः । चोदिताः प्रत्यदृश्यन्त पक्षिणामिव पङ्क्तयः ॥)
उन वीरोंने अपने विशाल और सुदृढ़ धनुषोंकी डोरियोंको यथाशक्ति ऊपर खींचकर धनुषके दूसरे सिरेपर चढ़ाया। फिर सुन्दर वस्त्र धारण करके चन्दनसे चर्चित हो उन समस्त वीर पाण्डवोंने नरदेव विराटकी आज्ञासे शीघ्रतापूर्वक अपने घोड़े हाँक दिये। अच्छी तरह रथका भार वहन करनेवाले वे स्वर्णभूषित विशाल अश्व हाँके जानेपर श्रेणीबद्ध होकर उड़ते हुए पक्षियोंके समान दिखायी देने लगे।
भीमाश्च मत्तमातङ्गाः प्रभिन्नकरटामुखाः । क्षरन्तश्चैव नागेन्द्राः सुदन्ताः षष्टिहायनाः ॥ ३१ ॥ स्वारूढा युद्धकुशलैः शिक्षिता हस्तिसादिभिः । राजानमन्वयुः पश्चाच्चलन्त इव पर्वताः ॥ ३२ ॥
जिनके गण्डस्थलसे मदकी धारा बहती थी, ऐसे भयंकर मतवाले हाथी तथा सुन्दर दाँतोंवाले साठ वर्षके मदवर्षी गजराज, जिन्हें युद्धकुशल महावतोंने शिक्षा दी थी, सवारोंको अपनी पीठपर चढ़ाये राजा विराटके पीछे-पीछे इस प्रकार जा रहे थे, मानो चलते-फिरते पर्वत हों ॥ ३१-३२ ॥
विशारदानां मुख्यानां हृष्टानां चारुजीविनाम् । अष्टौ रथसहस्राणि दश नागशतानि च ॥ ३३ ॥ षष्टिश्चाश्वसहस्राणि मत्स्यानामभिनिर्ययुः । तदनीकं विराटस्य शुशुभे भरतर्षभ ॥ ३४ ॥