भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 234

यथा काष्ठेन वा काष्ठमश्मानं चाश्मना पुनः । अयसा चाप्ययश्छिन्द्यान्निर्विचेष्टमचेतनम् ॥ ३५ ॥ एवं स भगवान् देवः स्वयम्भूः प्रपितामहः । हिनस्ति भूतैर्भूतानि च्छद्म कृत्वा युधिष्ठिर ॥ ३६ ॥ महाराज युधिष्ठिर! जैसे अचेतन एवं चेष्टारहित काठ, पत्थर और लोहेको मनुष्य काठ, पत्थर और लोहेसे ही काट देता है, उसी प्रकार सबके प्रपितामह स्वयम्भू भगवान् श्रीहरि मायाकी आड़ लेकर प्राणियोंसे ही प्राणियोंका विनाश करते हैं ॥ ३५-३६ ॥

सम्प्रयोज्य वियोज्यायं कामकारकरः प्रभुः । क्रीडते भगवान् भूतैर्बालः क्रीडनकैरिव ॥ ३७ ॥ जैसे बालक खिलौनोंसे खेलता है, उसी प्रकार स्वेच्छानुसार कर्म (भाँति-भाँतिकी लीलाएँ) करने-वाले शक्तिशाली भगवान् सब प्राणियोंके साथ उनका परस्पर संयोग-वियोग कराते हुए लीला करते रहते हैं ॥ ३७ ॥

न मातृपितृवद् राजन् धाता भूतेषु वर्तते । रोषादिव प्रवृत्तोऽयं यथायमितरो जनः ॥ ३८ ॥ राजन्! मैं समझती हूँ, ईश्वर समस्त प्राणियोंके प्रति माता-पिताके समान दया एवं स्नेहयुक्त बर्ताव नहीं कर रहे हैं, वे तो दूसरे लोगोंकी भाँति मानो रोषसे ही व्यवहार कर रहे हैं ॥ ३८ ॥

आर्याञ्छीलवतो दृष्ट्वा ह्रीमतो वृत्तिकर्शितान् । अनार्यान् सुखिनश्चैव विह्वलामीव चिन्तया ॥ ३९ ॥ क्योंकि जो लोग श्रेष्ठ, शीलवान् और संकोची हैं, वे तो जीविकाके लिये कष्ट पा रहे हैं; किंतु जो अनार्य (दुष्ट) हैं, वे सुख भोगते हैं; यह सब देखकर मेरी उक्त धारणा पुष्ट होती है और मैं चिन्तासे विह्वल-सी हो रही हूँ ॥ ३९ ॥

तवेमामापदं दृष्ट्वा समृद्धिं च सुयोधने । धातारं गर्हये पार्थ विषमं योऽनुपश्यति ॥ ४० ॥ कुन्तीनन्दन! आपकी इस आपत्तिको तथा दुर्योधनकी समृद्धिको देखकर मैं उस विधाताकी निन्दा करती हूँ, जो विषम दृष्टिसे देख रहा है अर्थात् सज्जनको दुःख और दुर्जनको सुख देकर उचित विचार नहीं कर रहा है ॥ ४० ॥

आर्यशास्त्रातिगे क्रूरे लुब्धे धर्मापचायिनि । धार्तराष्ट्रे श्रियं दत्त्वा धाता किं फलमश्नुते ॥ ४१ ॥ जो आर्यशास्त्रोंकी आज्ञाका उल्लंघन करनेवाला, क्रूर, लोभी तथा धर्मकी हानि करनेवाला है, उस धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनको धन देकर विधाता क्या फल पाता है? ॥ ४१ ॥

कर्म चेत् कृतमन्वेति कर्तारं नान्यमृच्छति । कर्मणा तेन पापेन लिप्यते नूनमीश्वरः ॥ ४२ ॥