महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2350, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंकुन्तीपुत्र युधिष्ठिरने एक हजार त्रिगर्तोंको मार गिराया। भीमसेनने सात हजार योद्धाओंको यमलोकका दर्शन कराया ।। ३३ ।।
नकुलश्चापि सप्तैव शतानि प्राहिणोच्छरैः ।
शतानि त्रीणि शूराणां सहदेवः प्रतापवान् ।। ३४ ।।
युधिष्ठिरसमादिष्टो निजघ्ने पुरुषर्षभः ।
नकुलने अपने बाणोंसे सात सौ सैनिकोंको यमराजके घर भेज दिया तथा पुरुषोंमें श्रेष्ठ प्रतापी वीर सहदेवने युधिष्ठिरकी आज्ञासे तीन सौ शूरवीरोंका संहार कर डाला ।। ३४ १/२ ।।
ततोऽभ्यपतदत्युग्रः सुशर्माणमुदायुधः ।। ३५ ।।
हत्वा तां महतीं सेनां त्रिगर्तानां महारथः ।
तदनन्तर महारथी सहदेव त्रिगर्तोंकी उस महासेनाका संहार करके अत्यन्त उग्र रूप धारण किये हाथमें धनुष ले सुशर्मापर चढ़ आये ।। ३५ १/२ ।।
ततो युधिष्ठिरो राजा त्वरमाणो महारथः ।। ३६ ।।
अभिपत्य सुशर्माणं शरैरभ्याहनद् भृशम् ।
तत्पश्चात् महारथी राजा युधिष्ठिर भी बड़ी उतावलीके साथ सुशर्मापर धावा बोलकर उसे बाणोंद्वारा बारंबार बींधने लगे ।। ३६ १/२ ।।
सुशर्मापि सुसंरब्धस्त्वरमाणो युधिष्ठिरम् ।। ३७ ।।
अविध्यन्नवभिर्बाणैश्चतुर्भिश्चतुरो हयान् ।
तब सुशर्माने भी अत्यन्त कुपित हो बड़ी फुर्तीके साथ नौ बाणोंसे राजा युधिष्ठिरको और चार बाणोंसे उनके चारों घोड़ोंको बींध डाला ।। ३७ १/२ ।।
ततो राजन्नाशुकारी कुन्तीपुत्रो वृकोदरः ।। ३८ ।।
समासाद्य सुशर्माणमश्वानस्य व्यपोथयत् ।
पृष्ठगोपांश्च तस्याथ हत्वा परमसायकैः ।। ३९ ।।
अथास्य सारथिं क्रुद्धो रथोपस्थादपातयत् ।
राजन्! फिर तो शीघ्रता करनेवाले कुन्तीपुत्र भीमने सुशर्माके पास पहुँचकर उत्तम बाणोंसे उसके घोड़ोंको मार डाला। साथ ही उसके पृष्ठरक्षकोंको भी मारकर कुपित हो उसके सारथिको भी रथसे नीचे गिरा दिया ।। ३८-३९ १/२ ।।
चक्ररक्षश्च शूरो वै मदिराक्षोऽतिविश्रुतः ।। ४० ।।
समायाद् विरथं दृष्ट्वा त्रिगर्तं प्राहरत् तदा ।
सुशर्माको रथहीन हुआ देखकर राजा विराटके चक्ररक्षक सुप्रसिद्ध वीर मदिराक्ष भी वहाँ आ पहुँचे और त्रिगर्तनरेशपर बाणोंसे प्रहार करने लगे ।। ४० १/२ ।।
ततो विराटः प्रस्कन्द्य रथादथ सुशर्मणः ।। ४१ ।।
गदां तस्य परामृश्य तमेवाभ्यद्रवद् बली ।