भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 2366, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 2366

न सामर्षत पाञ्चाली बीभत्सोः परिकीर्तनम् ॥ १४ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! उत्तर स्त्रियोंके बीचमें बैठा था और बार-बार अपनी तुलनामें अर्जुनका नाम ले-लेकर डींग मार रहा था। पांचालराजकुमारी द्रौपदीसे यह सहन न हो सका ॥ १४ ॥ अथैनमुपसंगम्य स्त्रीमध्यात् सा तपस्विनी । व्रीडमानेव शनकैरिदं वचनमब्रवीत् ॥ १५ ॥ वह तपस्विनी स्त्रियोंके बीचसे उठकर उत्तरके समीप आयी और लजाती हुई-सी धीरे-धीरे इस प्रकार बोली— ॥ १५ ॥ योऽसौ बृहद्वारणाभो युवा सुप्रियदर्शनः । बृहन्नलेति विख्यातः पार्थस्यासीत् स सारथिः ॥ १६ ॥ ‘राजकुमार! यह जो विशाल गजराजके समान हृष्ट-पुष्ट, तरुण, सुन्दर और देखनेमें अत्यन्त प्रिय ‘बृहन्नला’ नामसे विख्यात नर्तक है, पहले कुन्तीपुत्र अर्जुनका सारथि था ॥ १६ ॥ धनुष्यनवरश्चासीत् तस्य शिष्यो महात्मनः । दृष्टपूर्वो मया वीर चरन्त्या पाण्डवान् प्रति ॥ १७ ॥ ‘वीर! यह उन्हीं महात्माका शिष्य है, अतः धनुर्विद्यामें भी उनसे कम नहीं है। पहले पाण्डवोंके यहाँ रहते समय मैंने इसे देखा है ॥ १७ ॥ यदा तत् पावको दावमदहत् खाण्डवं महत् । अर्जुनस्य तदानेन संगृहीता हयोत्तमाः ॥ १८ ॥ ‘जिन दिनों अर्जुनकी सहायतासे अग्निदेवने दावानलरूप हो महान् खाण्डववनको जलाया था, उस समय इसीने अर्जुनके श्रेष्ठ घोड़ोंकी बागडोर सँभाली थी ॥ १८ ॥ तेन सारथिना पार्थः सर्वभूतानि सर्वशः । अजयत् खाण्डवप्रस्थे न हि यन्तास्ति तादृशः ॥ १९ ॥ ‘इसी सारथिके सहयोगसे कुन्तीपुत्र अर्जुनने खाण्डवप्रस्थमें सम्पूर्ण प्राणियोंपर विजय पायी थी; अतः इसके समान दूसरा कोई सारथि नहीं है ॥ १९ ॥

उत्तर उवाच

सैरन्ध्रि जानासि तथा युवानं नपुंसको नैव भवेद् यथासौ । अहं न शक्नोमि बृहन्नलां शुभे वक्तुं स्वयं यच्छ हयान् ममेति वै ॥ २० ॥ **उत्तरने कहा—**सैरन्ध्री! वह युवक ऐसे गुणोंसे विभूषित है कि वह नपुंसक नहीं हो सकता; इन बातोंको तुम अच्छी तरह जानती हो; [अतः तुम उससे कह दो, तो ठीक है।]

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