भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 2372

का शक्तिर्मम सारथ्यं कर्तुं संग्राममूर्धनि ॥ २० ॥ उसके ऐसा कहनेपर बृहन्नला राजकुमारसे बोली—‘भला, मेरी क्या शक्ति है कि मैं युद्धके मुहानेपर सारथिका काम सँभाल सकूँ? ॥ २० ॥ गीतं वा यदि वा नृत्यं वादित्रं वा पृथग्विधम् । तत् करिष्यामि भद्रं ते सारथ्यं तु कुतो मम ॥ २१ ॥ ‘राजकुमार! आपका कल्याण हो। यदि गाना हो, नृत्य करना हो अथवा विभिन्न प्रकारके बाजे बजाने हों, तो वह कर लूँगी। सारथिका काम मुझसे कैसे हो सकता है? ॥ २१ ॥

उत्तर उवाच

बृहन्नले गायनो वा नर्तनो वा पुनर्भव । क्षिप्रं मे रथमास्थाय निगृह्णीष्व हयोत्तमान् ॥ २२ ॥ **उत्तर बोला—**बृहन्नले! तुम पुनः लौटकर गायक या नर्तक जो चाहो, बन जाना। इस समय तो शीघ्र ही मेरे रथपर बैठकर श्रेष्ठ घोड़ोंको काबूमें करो ॥ २२ ॥

वैशम्पायन उवाच

स तत्र नर्मसंयुक्तमकरोत् पाण्डवो बहु । उत्तरायाः प्रमुखतः सर्वं जानन्नरिंदमः ॥ २३ ॥ **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! शत्रुओंका दमन करनेवाले पाण्डुनन्दन अर्जुनने सब कुछ जानते हुए भी उत्तराके सामने हँसीके लिये बहुत-से अनभिज्ञतासूचक कार्य किये ॥ २३ ॥ ऊर्ध्वमुत्क्षिप्य कवचं शरीरे प्रत्यमुञ्चत । कुमार्यस्तत्र तं दृष्ट्वा प्राहसन् पृथुलोचनाः ॥ २४ ॥ वे कवचको ऊपर उठाकर शरीरमें डालने लगे। यह देखकर वहाँ खड़ी हुई बड़े-बड़े नेत्रोंवाली राजकुमारियाँ हँसने लगीं ॥ २४ ॥ स तु दृष्ट्वा विमुह्यन्तं स्वयमेवोत्तरस्ततः । कवचेन महार्हेण समनह्यद् बृहन्नलाम् ॥ २५ ॥ बृहन्नलाको (कवच धारणके समय) भूल करती देख राजकुमार उत्तरने स्वयं ही उसे बहुमूल्य कवच धारण कराया ॥ २५ ॥ स बिभ्रत् कवचं चाग्र्यं स्वयमप्यंशुमत्प्रभम् । ध्वजं च सिंहमुच्छ्रित्य सारथ्ये समकल्पयत् ॥ २६ ॥ फिर उसने स्वयं भी सूर्यके समान कान्तिमान् सुन्दर कवच धारण किया और रथपर सिंहध्वज फहराकर बृहन्नलाको सारथिके कार्यमें नियुक्त कर दिया ॥ २६ ॥ धनूंषि च महार्हाणि बाणांश्च रुचिरान् बहून् ।