भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2388

सदा भवान् फाल्गुनस्य गुणैरस्मान् विकत्थसे ।
न चार्जुनः कलापूर्णो मम दुर्योधनस्य च ॥ १४ ॥
**कर्णने कहा—**आचार्य! आप सदा हमारे सामने अर्जुनके गुणोंकी श्लाघा करते रहते हैं, परंतु अर्जुन मेरी और दुर्योधनकी सोलहवीं कलाके भी बराबर नहीं है ॥

दुर्योधन उवाच
यद्येष पार्थो राधेय कृतं कार्यं भवेन्मम ।
ज्ञाताः पुनश्चरिष्यन्ति द्वादशाब्दान् विशाम्पते ॥ १५ ॥
**दुर्योधनने कहा—**राधानन्दन! यदि यह अर्जुन है; तब तो मेरा काम ही बन गया। अंगराज! अब ये पाण्डव पहचान लिये जानेके कारण फिर बारह वर्षोंतक वनमें भटकेंगे ॥ १५ ॥
अथैष कश्चिदेवान्यः क्लीबवेषेण मानवः ।
शरैरेनं सुनिशितैः पातयिष्यामि भूतले ॥ १६ ॥
और यदि यह नपुंसकवेशमें कोई दूसरा ही मनुष्य है, तो इसे अत्यन्त तीखे बाणोंद्वारा अभी इस भूतलपर मार गिराऊँगा ॥ १६ ॥

वैशम्पायन उवाच
तस्मिन् ब्रुवति तद् वाक्यं धार्तराष्ट्रे परंतप ।
भीष्मो द्रोणः कृपो द्रौणिः पौरुषं तदपूजयन् ॥ १७ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**परंतप! धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनके ऐसा कहनेपर भीष्म, द्रोण, कृप और अश्वत्थामाने उसके इस पराक्रमकी बड़ी प्रशंसा की ॥

इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि गोहरणपर्वणि उत्तरगोग्रहे
अर्जुनप्रशंसायामेकोनचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ३९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत गोहरणपर्वमें उत्तर दिशाकी ओरसे गौओंके अपहरणके प्रसंगमें अर्जुनकी प्रशंसाविषयक उनतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३९ ॥