महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिवेष्टनमेतेषां क्षिप्रं चैव व्यपानुद । **वैशम्पायनजी कहते हैं—**जनमेजय! अर्जुनके ऐसा कहनेपर कुण्डलधारी विराटपुत्र उत्तर विवश हो रथसे कूदकर शमीवृक्षपर चढ़ गया। तब रथपर बैठे हुए शत्रुनाशक पृथापुत्र धनंजयने शासनके स्वरमें कहा—'इन धनुषोंको जल्दी वृक्षसे नीचे उतारो और इन सबका पत्रमय वेष्टन भी शीघ्र हटा दो' ।। ६-७ १/२ ।।
सोऽपहृत्य महार्हाणि धनूंषि पृथुवक्षसाम् । परिवेष्टनपत्राणि विमुच्य समुपानयत् ।। ८ ।। तथा संहननान्येषां परिमुच्य समन्ततः । अपश्यद् गाण्डिवं तत्र चतुर्भिरपरैः सह ।। ९ ।। तब उत्तरने विशाल वक्षःस्थलवाले पाण्डवोंके बहुमूल्य धनुषोंको वृक्षके नीचे ले आकर उनपर जो पत्तोंके वेष्टन लगे थे, उन्हें खोलकर हटाया। फिर उन धनुषों तथा उनकी डोरियोंको सब ओरसे खोलकर अर्जुनके पास ले आया। उसमें अन्य चार धनुषोंके साथ रखे हुए गाण्डीव धनुषको उत्तरने देखा ।। ८-९ ।।
तेषां विमुच्यमानानां धनुषामर्कवर्चसाम् । विनिश्चेरुः प्रभा दिव्या ग्रहाणामुदयेष्विव ।। १० ।। वेष्टन खोलनेपर उन सूर्यके समान तेजस्वी धनुषोंकी प्रभा चारों ओर फैल गयी, जैसे उदय होनेपर ग्रहोंका दिव्य प्रकाश सब ओर छा जाता है ।। १० ।।
स तेषां रूपमालोक्य भोगिनामिव जृम्भताम् । हृष्टरोमा भयोद्विग्नः क्षणेन समजायत ।। ११ ।। संस्पृश्य तानि चापानि भानुमन्ति बृहन्ति च । वैराटिरर्जुनं राजन्निदं वचनमब्रवीत् ।। १२ ।। जँभाई लेनेके लिये मुँह खोले हुए विशाल सर्पोंकी भाँति उन धनुषोंका रूप देखकर उत्तरके शरीरमें रोमांच हो आया और वह क्षणभरमें भयसे उद्विग्न हो गया। राजन्! तदनन्तर उन प्रभापूर्ण विशाल धनुषोंका स्पर्श करके विराटपुत्र उत्तरने अर्जुनसे इस प्रकार कहा ।।
इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि गोहरणपर्वणि उत्तरगोग्रहे अस्त्रावरोपणे एकचत्वारिंशोऽध्यायः ।। ४१ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत गोहरणपर्वमें उत्तरगोग्रहके अवसरपर वृक्षसे अस्त्रोंको उतारनेसे सम्बन्ध रखनेवाला इकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ४१ ।।