भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 2395, कुल 2580 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2395

जिसे गोचर्मकी म्यानमें रखा गया है, जो निषधदेशका बना हुआ है, जिसे कोई तोड़

नहीं सकता, जो भारी भार सह सकता है, वह सोनेकी मूठवाला विमल खड्ग किसका

है? ।। १३ १/२ ।।

कस्य पाञ्चनखे कोशे सायको हेमविग्रहः ।। १४ ।।

प्रमाणरूपसम्पन्नः पीत आकाशसंनिभः ।

जिसे बकरेके चमड़ेकी बनी हुई म्यानमें रखा गया है, जो सोनेकी मूठसे युक्त और

सुवर्णभूषित स्वरूपवाली है, वह उचित लंबाई-चौड़ाई एवं आकृतिवाली, आकाशके समान

नीलोज्ज्वल एवं पानीदार तलवार किसकी है? ।। १४ १/२ ।।

कस्य हेममये कोशे सुतप्ते पावकप्रभे ।। १५ ।।

निस्त्रिंशोऽयं गुरुः पीतः सायकः परनिर्त्रणः ।

कस्यायमसितः खड्गो हेमबिन्दुभिरावृतः ।। १६ ।।

आशीविषसमस्पर्शः परकायप्रभेदनः ।

गुरुभारसहो दिव्यः सपत्नानां भयप्रदः ।। १७ ।।*

जो अग्निके समान प्रकाशमान एवं आगमें तपाये शुद्ध सुवर्णकी बनी हुई म्यानमें

सुरक्षित, भारी, पानीदार तथा तीस अंगुलसे बड़ा है, जो स्वर्णबिन्दुओंसे विभूषित तथा

काले रंगका है, जिसे शत्रु काट नहीं सकते, जिसका स्पर्श सर्पके समान है, जो शत्रुके

शरीरको चीर डालनेवाला, भारी भार सहन करनेमें समर्थ, दिव्य एवं शत्रुओंके लिये

भयदायक है, वह खड्ग किसका है? ।।

निर्द्दिशस्व यथातत्त्वं मया पृष्ट बृहन्नले ।

विस्मयो मे परो जातो दृष्ट्वा सर्वमिदं महत् ।। १८ ।।

बृहन्नले! मैंने जो पूछा है, उसे ठीक-ठीक बताओ। ये सब महान् अस्त्र-शस्त्र देखकर

मुझे बड़ा आश्चर्य हो रहा है ।। १८ ।।

इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि गोहरणपर्वणि उत्तरवाक्यं नाम द्विचत्वारिंशोऽध्यायः

।। ४२ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत गोहरणपर्वमें उत्तरवाक्यविषयक बयालीसवाँ

अध्याय पूरा हुआ ।। ४२ ।।

  • ये १६, १७ श्लोक अन्य बहुत-सी प्रतियोंमें नहीं हैं, परंतु नीलकंठवाली प्रतिमें हैं, इसलिये यहाँ ले लिये गये हैं। किंतु

अगले अध्यायमें जो उत्तर दिया गया है, उससे इन श्लोकोंका मेल नहीं है।