महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2397, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहावीर्यं महादिव्यमेतत् तद् धनुरुत्तमम् । एतत् पार्थमनुप्राप्तं वरुणाच्चारुदर्शनम् ॥ ७ ॥ यह सर्वोत्तम धनुष देखनेमें बड़ा ही मनोहर है। इसके द्वारा महान् पराक्रम प्रकट होता है। अर्जुनको यह महादिव्य धनुष साक्षात् वरुणदेवसे प्राप्त हुआ था ॥ ७ ॥
पूजितं सुरमर्त्येषु बिभर्ति परमं वपुः । सुपार्श्वं भीमसेनस्य जातरूपग्रहं धनुः । येन पार्थोऽजयत् कृत्स्नां दिशं प्राचीं परंतपः ॥ ८ ॥ तथा दूसरा देवताओं और मनुष्योंमें पूजित उत्कृष्ट रूप धारण करनेवाला धनुष भीमसेनका है, जिसके दोनों किनारे बड़े सुन्दर हैं और मध्यभागमें सोना मढ़ा हुआ है। यह वही धनुष है, जिससे शत्रुओंको संताप देनेवाले कुन्तीकुमार भीमसेनने सम्पूर्ण प्राचीदिशापर विजय पायी थी ॥ ८ ॥
इन्द्रगोपकचित्रं च यदेतच्चारुदर्शनम् । राज्ञो युधिष्ठिरस्यैतद् वैराटे धनुरुत्तमम् ॥ ९ ॥ उत्तर! जिसके ऊपर 'इन्द्रगोप' (वीरबहूटी) नामक कीटोंका चित्र है और जो देखनेमें मनोहर है, वही यह उत्तम धनुष राजा युधिष्ठिरका है ॥ ९ ॥
सूर्या यस्मिंस्तु सौवर्णाः प्रकाशन्ते प्रकाशिनः । तेजसा प्रज्वलन्तो वै नकुलस्यैतदायुधम् ॥ १० ॥ जिसमें सुवर्णके बने हुए प्रकाशपूर्ण सूर्य प्रकाशित हो रहे हैं और जो तेजसे जाज्वल्यमान जान पड़ते हैं, वही यह नकुलका आयुध है ॥ १० ॥
शलभा यत्र सौवर्णास्तपनीयविचित्रिताः । एतन्माद्रीसुतास्यापि सहदेवस्य कार्मुकम् ॥ ११ ॥ जिसके ऊपर सुवर्णजटित मीनेके फतिंगे सुशोभित हैं, वही यह माद्रीनन्दन सहदेवका धनुष है ॥ ११ ॥
ये त्विमे क्षुरसंकाशाः सहस्रा लोमवाहिनः । एतेऽर्जुनस्य वैराटे शराः सर्पविषोपमाः ॥ १२ ॥ विराटपुत्र! ये जो छुरेके समान मजबूत और चमकीले बाण हैं, जिनमें पंख लगे हुए हैं और जो साँपोंके विषके समान प्रभाव रखते हैं, ये सब अर्जुनके ही हैं ॥ १२ ॥
एते ज्वलन्तः संग्रामे तेजसा शीघ्रगामिनः । भवन्ति वीरस्याक्षय्या व्यूहतः समरे रिपून् ॥ १३ ॥ ये युद्धमें तेजसे प्रकाशित होकर बड़ी तेजीसे शत्रुपर आघात करते हैं। रणमें शत्रुओंपर बाणवर्षा करनेवाले वीरके लिये भी इन बाणोंका काटना असम्भव है ॥ १३ ॥
ये चेमे पृथवो दीर्घाश्चन्द्रबिम्बार्धदर्शनाः । एते भीमस्य निशिता रिपुक्षयकराः शराः ॥ १४ ॥