महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 240, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंईश्वराः कस्य हेतोस्ते चरेयुर्धर्ममादृताः ॥ २९ ॥ यदि तप, ब्रह्मचर्य, यज्ञ, स्वाध्याय, दान और सरलता आदि धर्म निष्फल होते तो पहले जो श्रेष्ठ और श्रेष्ठतर पुरुष हुए हैं वे धर्मका आचरण नहीं करते। यदि धार्मिक क्रियाओंका कुछ फल नहीं होता, वे सब निरी ठगविद्या होतीं तो ऋषि, देवता, गन्धर्व, असुर तथा राक्षस प्रभावशाली होते हुए भी किसलिये आदरपूर्वक धर्मका आचरण करते ॥ २७—२९ ॥
फलदं त्विह विज्ञाय धातारं श्रेयसि ध्रुवम् । धर्मं ते व्यचरन् कृष्णे तद्धि श्रेयः सनातनम् ॥ ३० ॥ कृष्णे! यहाँ धर्मका फल देनेवाले ईश्वर अवश्य हैं, यह बात जानकर ही उन ऋषि आदिकोंने धर्मका आचरण किया है। धर्म ही सनातन श्रेय है ॥ ३० ॥
स नायमफलो धर्मो नाधर्मोऽफलवानपि । दृश्यन्तेऽपि हि विद्यानां फलानि तपसां तथा ॥ ३१ ॥ त्वमात्मनो विजानीहि जन्म कृष्णे यथा श्रुतम् । वेत्थ चापि यथा जातो धृष्टद्युम्नः प्रतापवान् ॥ ३२ ॥ धर्म निष्फल नहीं होता। अधर्म भी अपना फल दिये बिना नहीं रहता। विद्या और तपस्याके भी फल देखे जाते हैं। कृष्णे! तुम अपने जन्मके प्रसिद्ध वृत्तान्तको ही स्मरण करो। तुम्हारा प्रतापी भाई धृष्टद्युम्न जिस प्रकार उत्पन्न हुआ है, यह भी तुम जानती हो ॥ ३१-३२ ॥
एतावदेव पर्याप्तमुपमानं शुचिस्मिते । कर्मणां फलमाप्नोति धीरोऽल्पेनापि तुष्यति ॥ ३३ ॥ पवित्र मुसकानवाली द्रौपदी! इतना ही दृष्टान्त देना पर्याप्त है। धीर पुरुष कर्मोंका फल पाता है और थोड़े-से फलसे भी संतुष्ट हो जाता है ॥ ३३ ॥
बहुनापि ह्यविद्वांसो नैव तुष्यन्त्यबुद्धयः । तेषां न धर्मजं किंचित् प्रेत्य शर्मास्ति वा पुनः ॥ ३४ ॥ परंतु बुद्धिहीन अज्ञानी मनुष्य बहुत पाकर भी संतुष्ट नहीं होते। उन्हें परलोकमें धर्मजनित थोड़ा-सा भी सुख नहीं मिलता ॥ ३४ ॥
कर्मणां श्रुतपुण्यानां पापानां च फलोदयः । प्रभवश्चात्ययश्चैव देवगुह्यानि भामिनि ॥ ३५ ॥ भामिनि! वेदोक्त पुण्य देनेवाले सत्कर्मों और अनिष्टकारी पापकर्मोंका फलोदय तथा उत्पत्ति और प्रलय—ये सब देवगुह्य हैं (देवता ही उन्हें जानते हैं) ॥ ३५ ॥
नैतानि वेद यः कश्चिन्मुह्यन्तेऽत्र प्रजा इमाः । अपि कल्पसहस्रेण न स श्रेयोऽधिगच्छति ॥ ३६ ॥ इन देवगुह्य विषयोंमें साधारण लोग मोहित हो जाते हैं। जो इन सबको तात्त्विकरूपसे नहीं जानता है, वह सहस्रों कल्पोंमें भी कल्याणका भागी नहीं हो सकता ॥ ३६ ॥