भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 2402, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 2402

मध्ये धनस्य तिष्ठामि तेनाहुर्मां धनंजयम् ॥ १३ ॥ **अर्जुनने कहा—**मैं सम्पूर्ण देशोंको जीतकर और उनसे (कररूपमें) केवल धन लेकर धनके ही बीचमें स्थित था, इसलिये लोग मुझे 'धनंजय' कहते हैं ॥ १३ ॥ अभिप्रयामि संग्रामे यदहं युद्धदुर्मदान् । नाजित्वा विनिवर्तामि तेन मां विजयं विदुः ॥ १४ ॥ जब मैं संग्रामभूमिमें रणोन्मत्त योद्धाओंका सामना करनेके लिये जाता हूँ, तब उन्हें परास्त किये बिना कभी नहीं लौटता। इसीलिये वीर पुरुष मुझे 'विजय' के नामसे जानते हैं ॥ १४ ॥ श्वेताः काञ्चनसंनाहा रथे युज्यन्ति मे हयाः । संग्रामे युध्यमानस्य तेनाहं श्वेतवाहनः ॥ १५ ॥ उत्तराभ्यां फल्गुनीभ्यां नक्षत्राभ्यामहं दिवा । जातो हिमवतः पृष्ठे तेन मां फाल्गुनं विदुः ॥ १६ ॥ संग्राममें युद्ध करते समय मेरे रथमें सोनेके बख्तरसे सजे हुए श्वेत रंगके घोड़े जोते जाते हैं, इसलिये मेरा नाम 'श्वेतवाहन' हुआ है तथा हिमालयके शिखरपर उत्तराफाल्गुनी नक्षत्रमें दिनके समय मेरा जन्म हुआ था; इसलिये मुझे 'फाल्गुन' कहते हैं ॥ १५-१६ ॥ पुरा शक्रेण मे दत्तं युध्यतो दानवर्षभैः । किरीटं मूर्ध्नि सूर्याभं तेनाहुर्मां किरीटिनम् ॥ १७ ॥ पूर्वकालमें बड़े-बड़े दानव वीरोंके साथ युद्ध करते समय देवराज इन्द्रने मेरे मस्तकपर सूर्यके समान प्रकाशित होनेवाला किरीट रख दिया था; इसीलिये मुझे 'किरीटी' कहते हैं ॥ १७ ॥ न कुर्यां कर्म बीभत्सं युध्यमानः कथंचन । तेन देवमनुष्येषु बीभत्सुरिति विश्रुतः ॥ १८ ॥ युद्ध करते समय मैं किसी प्रकार भी बीभत्स (घृणित) कर्म नहीं करता; इसीलिये देवताओं और मनुष्योंमें मेरी 'बीभत्सु' नामसे प्रसिद्धि हुई है ॥ १८ ॥ उभौ मे दक्षिणौ पाणी गाण्डीवस्य विकर्षणे । तेन देवमनुष्येषु सव्यसाचीति मां विदुः ॥ १९ ॥ मेरा बाँया और दाहिना दोनों हाथ गाण्डीव धनुषकी डोरी खींचनेमें समर्थ हैं, इसलिये देवताओं और मनुष्योंमें लोग मुझे 'सव्यसाची' समझते हैं ॥ १९ ॥ पृथिव्यां चतुरन्तायां वर्णो मे दुर्लभः समः । करोमि कर्म शुक्लं च तस्मान्मामर्जुनं विदुः ॥ २० ॥ (अर्जुन शब्दके तीन अर्थ हैं—वर्ण या दीप्ति, ऋजुता या समता, धवल या शुद्ध।) चारों ओर समुद्रपर्यन्त पृथ्वीपर मेरे-जैसी दीप्ति दुर्लभ है। मैं सबके प्रति समभाव रखता हूँ और शुद्ध कर्म करता हूँ। इसी कारण विज्ञ पुरुष मुझे 'अर्जुन' के नामसे जानते हैं ॥ २० ॥

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