महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(वह चिन्ता इस प्रकार है—) आपका एक-एक अवयव तथा रूप सब प्रकारसे उपयुक्त है। आप लक्षणोंद्वारा भी अलौकिक सूचित हो रहे हैं। ऐसी दशामें भी किस कर्मके परिणामसे आपको यह नपुंसकता प्राप्त हुई है? ।। १२ ।। मन्ये त्वां क्लीबवेषेण चरन्तं शूलपाणिनम् । गन्धर्वराजप्रतिमं देवं वापि शतक्रतुम् ।। १३ ।। मैं तो नपुंसकवेषमें विचरनेवाले आपको शूलपाणि भगवान् शंकरका स्वरूप मानता हूँ अथवा गन्धर्वराजके समान या साक्षात् देवराज इन्द्र समझता हूँ ।। १३ ।। अर्जुन उवाच (उर्वशीशापसम्भूतं क्लैब्यं मां समुपस्थितम् । पुराहमाज्ञया भ्रातुर्ज्येष्ठस्यास्मि सुरालयम् ।। प्राप्तवानुर्वशी दृष्टा सुधर्मायां मया तदा । नृत्यन्ती परमं रूपं बिभ्रती वज्रिसंनिधौ ।। अपश्यंस्तामनिमिषं कूटस्थामन्वयस्य मे । रात्रौ समागता मह्यं शयानं रन्तुमिच्छया ।। अहं तामभिवाद्यैव मातृसत्कारमाचरम् । सा च मामशपत् क्रुद्धा शिखण्डी त्वं भवेरिति ।। श्रुत्वा तमिन्द्रो मामाह मा भैस्त्वं पार्थ षण्ढतः । उपकारो भवेत् तुभ्यमज्ञातवसतौ पुरा ।। इतीन्द्रो मामनुग्राह्य ततः प्रेषितवान् वृषा । तदिदं समनुप्राप्तं व्रतं तीर्णं मयानघ ।।) अर्जुन बोले—महाबाहो! उर्वशीके शापसे मुझे यह नपुंसकभाव प्राप्त हुआ है। पूर्वकालमें मैं अपने बड़े भाईकी आज्ञासे देवलोकमें गया था। वहाँ सुधर्मा नामक सभामें मैंने उस समय उर्वशी अप्सराको देखा। वह परम सुन्दर रूप धारण करके वज्रधारी इन्द्रके समीप नृत्य कर रही थी। मेरे वंशकी मूलहेतु (जननी) होनेके कारण मैं उसे अपलक नेत्रोंसे देखने लगा। तब वह रातमें सोते समय रमणकी इच्छासे मेरे पास आयी, परंतु मैंने उसे प्रणाम करके (उसकी इच्छाकी पूर्ति न करके) उसका माताके समान सत्कार किया। तब उसने कुपित होकर मुझे शाप दे दिया—'तुम नपुंसक हो जाओ।' तब इन्द्रने वह शाप सुनकर मुझसे कहा—'पार्थ! तुम नपुंसक होनेसे डरो मत। यह तुम्हारे लिये अज्ञातवासके समय उपकारक होगा।' इस प्रकार देवराज इन्द्रने मुझपर अनुग्रह करके यह आश्वासन दिया और स्वर्गलोकसे यहाँ भेजा। अनघ! वही यह व्रत प्राप्त हुआ था, जिसको मैंने पूरा किया है। भ्रातुर्नियोगाज्ज्येष्ठस्य संवत्सरमिदं व्रतम् ।