महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2410, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंतब अर्जुनने उन्हें प्रणाम करके अपने हाथसे उनका स्पर्श किया और कहा—'आप सब लोग मेरे मनमें निवास करें' ॥ २८ ॥ प्रतिगृह्य ततोऽस्त्राणि प्रहृष्टवदनोऽभवत् । अधिज्यं तरसा कृत्वा गाण्डीवं व्याक्षिपद् धनुः ॥ २९ ॥ इस प्रकार अपने अस्त्र-शस्त्रोंको अनुकूल करके अर्जुनका मुखारविन्द प्रसन्नतासे खिल उठा। उन्होंने बड़े वेगसे गाण्डीव धनुषपर प्रत्यंचा चढ़ाकर उसकी टंकार की ॥ २९ ॥ तस्य विक्षिप्यमाणस्य धनुषोऽभून्महाध्वनिः । यथा शैलस्य महतः शैलेनैवावजघ्नतः ॥ ३० ॥ उस धनुषकी टंकारके समय बड़े जोरका शब्द हुआ, मानो किसी महान् पर्वतको पर्वतसे ही टक्कर लगी हो ॥ ३० ॥ स निर्घातोऽभवद् भूमिभिद् दिक्षु वायुर्ववौ भृशम् । पपात महती चोल्का दिशो न प्रचकाशिरे । भ्रान्तध्वजं खं तदासीत् प्रकम्पितमहाद्रुमम् ॥ ३१ ॥ तं शब्दं कुरवोऽजानन् विस्फोटमशनेरिव । यदर्जुनो धनुःश्रेष्ठं बाहुभ्यामाक्षिपद् रथे ॥ ३२ ॥ वह भयानक शब्द पृथ्वीको विदीर्ण करता-सा गूँज उठा। सम्पूर्ण दिशाओंमें प्रचण्ड आँधी चलने लगी, महान् उल्कापात होने लगा और दिशाओंमें अन्धकार छा गया। शत्रुसेनाके ध्वज आकाशमें अकारण हिलने लगे। बड़े-बड़े वृक्ष भी हिलने लगे। अर्जुनने अपने दोनों हाथोंसे रथपर बैठे-बैठे जो अपने श्रेष्ठ धनुषकी टंकार-ध्वनि की, उसे सुनकर कौरवोंने समझा, कहींसे बिजली टूट पड़ी है ॥ ३१-३२ ॥
उत्तर उवाच एकस्त्वं पाण्डवश्रेष्ठ बहूनेतान् महारथान् । कथं जेष्यसि संग्रामे सर्वशस्त्रास्त्रपारगान् ॥ ३३ ॥ **उस समय उत्तर बोला—**पाण्डवश्रेष्ठ! आप तो अकेले हैं, इन सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंके पारगामी बहुसंख्यक महारथियोंको युद्धमें कैसे जीत सकेंगे? ॥ ३३ ॥ असहायोऽसि कौन्तेय ससहायाश्च कौरवाः । अतएव महाबाहो भीतस्तिष्ठामि तेऽग्रतः ॥ ३४ ॥ कुन्तीनन्दन! आप असहाय हैं और कौरवोंके साथ बहुतेरे सहायक हैं। महाबाहो! यह सोचकर मैं आपके सामने भयभीत हो रहा हूँ ॥ ३४ ॥ उवाच पार्थो मा भैषीः प्रहस्य स्वनवत् तदा ॥ ३५ ॥ युध्यमानस्य मे वीर गन्धर्वैः सुमहाबलैः ।