भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 2415

इस प्रकार उस ध्वजको रथपर आया हुआ देख श्वेत घोड़ोंवाले कुन्तीनन्दन अर्जुनने उस रथकी परिक्रमा की तथा उसके ऊपर बैठकर अपनी अंगुलियोंमें गोहके चमड़ेके बने हुए दस्ताने धारण किये। फिर कपिश्रेष्ठ हनुमान्‌जीसे उपलक्षित ध्वजाको फहराते हुए गाण्डीव धनुषके साथ उत्तर दिशाकी ओर प्रस्थान किया ॥ ६-७ ॥ स्वनवन्तं महाशङ्खं बलवानरिमर्दनः । प्राधमद् बलमास्थाय द्विषतां लोमहर्षणम् ॥ ८ ॥ उस समय शत्रुमर्दक महाबली अर्जुनने घोर शब्द करनेवाले अपने महान् शंखको खूब जोर लगाकर बजाया। जिसकी आवाज सुनकर शत्रुओंके रोंगटे खड़े हो गये ॥ ८ ॥ (शशाङ्करूपं बीभत्सुः प्राध्मापयदरिन्दमः । शङ्खशब्दोऽस्य सोऽत्यर्थं श्रूयते कालमेघवत् ॥ तस्य शंखस्य शब्देन धनुषो निस्वनेन च । वानरस्य च नादेन रथनेमिस्वनेन च ॥ जङ्गमस्य भयं घोरमकरोत् पाकशासनिः ।) शत्रुदमन अर्जुनने जो महान् शंख फूँका था, वह चन्द्रमाके समान परम उज्ज्वल जान पड़ता था। उस शंखका जोर-जोरसे होनेवाला शब्द वर्षाकालके मेघकी गर्जनाके समान सुनायी देता था। शंखकी ध्वनि, धनुषकी टंकार, वानरकी गर्जना तथा रथके पहियोंकी घर्घराहटसे इन्द्रपुत्र अर्जुनने समस्त जंगम प्राणियोंके मनमें घोर भयका संचार कर दिया। ततस्ते जवना धुर्या जानुभ्यामगमन्महीम् । उत्तरश्चापि संत्रस्तो रथोपस्थ उपाविशत् ॥ ९ ॥ उस शंखध्वनिसे घबराकर रथके वेगशाली घोड़ोंने भी धरतीपर घुटने टेक दिये और उत्तर भी अत्यन्त भयभीत हो रथके ऊपरी भागमें जहाँ रथीका स्थान है, आ बैठा ॥ ९ ॥ संस्थाप्य चाश्वान् कौन्तेयः समुद्यम्य च रश्मिभिः । उत्तरं च परिष्वज्य समाश्वासयदर्जुनः ॥ १० ॥ तब कुन्तीनन्दन अर्जुनने स्वयं रास खींचकर घोड़ोंको खड़ा किया और उत्तरको हृदयसे लगाकर धीरज बँधाया ॥ १० ॥

अर्जुन उवाच

मा भैस्त्वं राजपुत्राग्र्य क्षत्रियोऽसि परंतप । कथं तु पुरुषव्याघ्र शत्रुमध्ये विषीदसि ॥ ११ ॥ अर्जुनने कहा— शत्रुओंको संताप देनेवाले राजकुमारशिरोमणे! डरो मत, तुम क्षत्रिय हो। पुरुषसिंह! शत्रुओंके बीचमें आकर घबराते कैसे हो? ॥ ११ ॥ श्रुतास्ते शङ्खशब्दाश्च भेरीशब्दाश्च पुष्कलाः । कुञ्जराणां च नदतां व्यूढानीकेषु तिष्ठताम् ॥ १२ ॥